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Anil "Pandit Sameer Khan"


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बलात्कारियों को फांसी नहीं होनी चाहिए!

Posted On: 20 Dec, 2012  
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हरियाणा नगरी चौटाला राजा

Posted On: 18 Oct, 2012  
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jaati

Posted On: 12 Oct, 2012  
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श्रृंगार रस की कविता

Posted On: 12 Oct, 2012  
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जय हो जायसवाल जी की….

Posted On: 10 Oct, 2012  
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लड़की ही नहीं लड़के को भी सुशील बनाइये

Posted On: 19 Sep, 2012  
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आरक्षण की आवश्यकता बनाम आरक्षण की राजनीति

Posted On: 11 Sep, 2012  
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Posted On: 10 Sep, 2012  
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हिंसा के विरोध में हिंसा-एक कुकर्म

Posted On: 18 Aug, 2012  
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Posted On: 9 Aug, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अनिल जी बहुत ही अच्छी सार्थक प्रस्तुति सार्थक आलेख की बधाई ,,,,,,,,,,,यदि आप को प्रतिबन्ध लगाना ही है तो अश्लील सिनेमा पर प्रतिबन्ध लगाइए, घटिया लोगो पर प्रतिबन्ध लगाइए, सेंसर बोर्ड का विरोध करिए, जो लोग सरे-आम लड़कियों को छेड़ते हैं उन्हें कठोर सजा दीजिये, बलात्कार करने वाले पुरुष को जेल की कोठरी तक पहुंचाइये! आप ये सब करने में असमर्थ है क्या? क्या आपके नियम-कानून सिर्फ लड़कियों पर ही लागू होते हैं? क्या बलात्कार करने वाले पुरुष आपसे अधिक शक्तिशाली हैं? या आप स्वयं मर्द प्रजाति के होने के कारण मर्दों पर अंकुश नहीं लगाना चाहते? क्या स्त्री वर्ग आपकी नजरो में इंसान नहीं, जिसे हमेशा आप अपनी दासी और भोग की वस्तु के रूप में देखते हैं! हमारे पूरे समाज की सोंच पुरुष प्रधान हो चुकी है,

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

समीर जी नमस्कार बहुत -२ बधाई ... आपने समस्या के हर बिंदु को छुआ और और तर्कपूर्ण और देशी तालिबानी संस्करण खाप के मूर्खतापूर्ण रवैया और चौटाला का वोट बैंक की खातिर किये गए असंवेदनशील समर्थन की सही झाड लगाई ... जरुरी है की हरियाणा तथा अन्य प्रान्तों में नैतिक मूल्यों की स्तापना . कानून का कड़ाई से पालन तथा बच्चियों को वयस्क होने तक हर तरह की शिक्षा दे कर उन्हें मजबूत बनाया जाए ... ताकि शादी के बाद भी किसी भी तरह की समस्या का सामना कर सके ... ये बाल विवाह की बात करते है ... अभी तो अरबो की जनसँख्या काबू में ही नहीं आरही .. लोगो को रहने खाने , कमाने के लाले पर रहे है .....जिसकी वजह से हाजारो समस्याए रोज मुंह बाए खड़ी है .... उससे निपटने के बजाये इनको देखो ... क्या बक रहे ... लग रहा है अब पाप का घड़ा भरने वाला है .. ये सारे ... अकाल मृत्यु को जायेगे ...... मेरी तो यही इच्छा है ....... पुनह बधाई आपको

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

क्षमा कीजियेगा सीमा जी, आपने निश्चित रूप से या तो मेरे लेख को पूरा नहीं पढ़ा, या फिर आप उसका अर्थ समझने में गच्चा खा गयीं अन्यथा ऐसा कोई कारण नहीं है जिससे यह कहा जा सके की मुझे जायसवाल से कोई हमदर्दी है! हाँ मेरी नज़र में भ्रष्टाचार, महंगाई, धार्मिक और जातिगत दंगे, नैतिक पतन तथा स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा तथा घर के अन्दर ही होने वाले उनके अपमान जैसे मुद्दे अधिक अहमियत रखते हैं.....मैंने तो सिर्फ यही चाहा है की ऐसा वक्तव्य देने वाले जायसवाल से सवाल-जवाब तथा उनका विरोध करने का हक किसी अन्य स्त्री से पहले स्वयं उनकी पत्नी का ही है, जब तक एक स्त्री अपने घर में, अपनों से अपने लिए सम्मान नहीं पाएगी तब तक बाकी दुनिया से उसे जितना भी सम्मान मिले, वह महज़ दिखावा ही होगा! आपकी जानकारी के लिए बता दूं की मैं "स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली घरेलु हिंसा" पर शोध कर रहा हूँ, इसलिए इसकी भयावह स्थिति से परिचित हूँ! फिर वाही बात कहना चाहूँगा- जब तक एक स्त्री अपने घर में, अपनों से अपने लिए सम्मान नहीं पाएगी तब तक बाकी दुनिया से उसे जितना भी सम्मान मिले, वह महज़ दिखावा ही होगा!

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

अनिल जी ,..सादर नमस्कार विचार्शीक प्रतिउत्तर के लिए बहुत आभारी हूँ ,..आपके विचारों का पूरा सम्मान करता हूँ,.....दरअसल विरोधाभास ही हमारी सच्चाई है ,..हमें स्वीकार करना होगा कि अलग अलग काल ,राज्य और परिस्थिति में अलग अलग स्थिति रही है ,.सत्य को झुठलाना मेरा मकसद नहीं है ,....मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि आपस में लड़ना समग्र रूप से हमारा नुक्सान ही करता है ,...आरक्षण यदि अपना मकसद पूरा करता तो अब तक समाप्त हो चूका होता और समाज बराबरी पा चूका होता ,....निजी अनुभवों और पिछले दो चार सौ सालों के लूट राज के आधार पर प्राकृतिक समतावादी संस्कृति को भूलना भी गलत है ,..मानसिकता बदलना ही सबसे सरल और कठिन है ,..पक्षपात और असमानता का हल लड़ाई नहीं है ,..आपने प्रतिक्रिया के सिर्फ नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दिया इसलिए कुछ खेद है ,. मैं निपट मूरख इंसान हूँ ,...इतिहास को ज्यादा नहीं समझ पाता ,..समझता हूँ तो अवसरवादिता और निजस्वार्थ ही दिखता है ,....वही विचार समझता हूँ जिनको महसूस करता हूँ ,...गांधीजी से बेहतर मैं अपने दादाजी को मानता हूँ ,.सामान्य जाती के होते हुए उनके अनेकों सर्व जाती घनिष्ठ मित्र थे ,..दलित पिछड़े सब उनके लिए बराबर थे ,....जरूरत पर उन्होंने खुद भूखे रहकर उनका साथ दिया ,... ..गांधीजी जब हर बात पर उपवास कर सकते थे ,..अछूतों का उद्धार कर महामानव बन सकते थे तो जातिओं को समाप्त करने के लिए क्यों कुछ नहीं किया ,..उस समय सामान शिक्षा की वकालत क्यों नहीं की ?...,जो कि गुरुकुल व्यवस्था लागू करवाकर संभव थी ,....क्यों विलायती बाबू उनको पसंद थे ?..मुझे पूरा यकीन है कि यदि वो ऐसा करते तो बाबा साहेब उनके विरोधी नहीं उनका दांया हाथ बनते ,..और अबतक देश से जातियों का अस्तित्व समाप्तप्राय हो गया होता . हमें अपने इतिहास की नकारात्मक बातें छोड़कर सकारात्मक पहलुओं को लेकर आगे बढ़ना चाहिए ,..सब सामान ही हैं ,.. ह्रदय से स्वीकारना शेष है ,..सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

अनिल जी, आरक्षण को लेकर दो तरह के वर्ग हो सकते हैं एक तो वे जिन्हें नहीं मिल रहा है और दूसरे वे जिन्हें मिल रहा है। राजनीति की पाटी में यह खेल चलता रहेगा परंतु इसे नकारा नहीं जा सकता कि समाज के उस वर्ग को उत्थान के लिए सम्बल देना जरूरी है जो सदियों से उपेक्षा झेलता आ रहा है। आखिर समान अवसर की अवधारणा पहले ही क्यों नहीं अमल में लाई गई। हालांकि, इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आरक्षण को जिस ढंग से लागू किया गया उससे वह असली वर्ग उपेक्षित ही है और शायद बना ही रहे जिसके लिए इसकी व्यवस्था दी गई। यही वजह है कि इस वर्ग में चुनिंदा लोगों को छोड़कर बाकी इससे महरूम ही हैं। ऐसे में जरूरी है कि न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर इसका विरोध करने वाले उन्हें इस तरह से आरक्षण दें कि वे बेहतर मुकाम हासिल करने में कठिनाई न महसूस करें और राजनीतिज्ञों की बजाय समाज के लोग ही इसे बेहतर ढंग से अमल में ला सकते हैं। अगर झगड़ा मिटाना है तब इसे सामाजिक परिपाटी पर कसना होगा वरना कानूनी दांव-पेंचों और राजनीति के बीच यह केवल मुद्दा भर बना रहेगा।

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

अनिलजी, आपने मेरी बात नहीं समझी. मेरे अनुसार मैंने एक बेहतरीन उदाहरण देकर आपको (बल्कि सभी जनरल कैटेगोरी के भाइयों से) समझाने की कोशिश की कि आरक्षण किस तरह से हमारे बीच है. आपके जवाब को पढ़कर लगा कि आप (या आपकी तरह सोचने वाले भाई) वस्तुत: आरक्षण के विरुद्ध नहीं हैं. सरकार की गलत पॉलिसी के विरूद्ध हैं. सरकार ने आरक्षण की पॉलिसी को ठीक ढंग से नहीं चलाया वर्ना आजादी के दस - पन्द्रह सालों तक हम सब शायद एक बराबर हों जाते. तो लड़ाई "आरक्षण हटाओ" की न हों करके "आरक्षण को सही ढंग से लागू करो" की लड़ाई होनी चाहिए. क्योंकि कम से कम यहाँ झारखंड में तो जरूरतमंदों की संख्या बहुत अधिक है. सुदूर गांवों में शायद ही लोगों को पता होगा कि "आरक्षण" नाम की कोई चीज होती है, सरकार ने उन्हें आगे बढ़ाने के लिये कुछ पॉलिसियां रखी हैं. लोग यहाँ कटहल के बीज ही खा कर दिन गुजारते हैं. ये हालत राँची के पास के एक गाँव की है. इस गाँव में कटहल बड़ी संख्या में होते हैं. खेती नहीं हो पाती और लोग कटहल के मौसम में कटहल का गूदा खाते हैं और बीज को उबालकर और सुखाकर रख लेते हैं. जो काफी समय तक ठीक-ठाक खाने योग्य रहता है. क्या आप ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे? आप नहीं चाहेंगे कि वो लोग कटहल के बीज के बजाय चावल या रोटी खाएं? वो कैसे ठीक से पढ़ लिख पाएंगे और कोई नौकरी पाएंगे अगर आरक्षण न हों. कल के उदाहरण से मिलता जुलता उदाहरण देना चाहूँगा. हमलोग घरों में भाई भाई में जमीनों का बंटवारा क्यों करते हैं? क्यों नहीं सभी भाई एक साथ रह कर प्रेम-पूर्वक जिंदगी बिताते हैं? क्योंकि उनके पिता जानते हैं कि उनमें से ताकतवर भाई सारी जमीन अकेले ले सकता है और बाकी भाई मुसीबत में पड़ सकते हैं. इस उदाहरण को अन्यथा न लें. और ऐसा कतई नहीं है कि आरक्षित होते हुए और कम मेहनत करके हमलोगों को कोई नौकरी आसानी से मिल जाती है. हमें अपने एस. टी. भाइयों/बहनों से कंपटीशन करना होता है और सच्चाई यह है कि आप लोगों का कंपटीशन आपके ही बीच है.

के द्वारा: ekaadivasi ekaadivasi

हरी जी, मैंने पूरे भारत की वस्तुस्थिति नहीं देखी है, न ही यह बहुत आसान है, मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ, लखनऊ इसकी राजधानी है और मैं लखनऊ में ही रहता हूँ! यानी लखनऊ में जो भी स्थिति होगी वह बाकी उत्तर प्रदेश से अच्छी ही होगी...लखनऊ में भी कई गाँव है और कई में मेरे मित्र रिश्तेदार इत्यादि रहते हैं...इसलिए काफी कुछ चीजे स्वयं देखी हैं मैं, साथ ही अखबार पढ़कर भी बहुत ज्ञान हो जाता है, इसके अलावा विधि का छात्र हूँ, इसलिए नियम कानूनों की भी जानकारी है.... अब बात रही आरक्षण का फायदा किस वर्ग को मिल रहा है और किस वर्ग को नहीं? ये तो क्षेत्र विशेष पर बहुत कुछ निर्भर करता है की वहा कैसा माहौल है...लेकिन कानूनन प्रत्येक अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को यह मिला हुआ है और ज़्यादातर क्षेत्रों में इस बात का ज्ञान प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को है! अब अगर आपको मुफ्त शिक्षा का अधिकार है, विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था आपके लिए है, सरकारी विद्यालयों में मुफ्त कॉपी किताब भी मिलती हैं, फिर भी आप अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, चाहे किसी डर के कारण या इस कारण की ६-७ वर्ष की अवस्था में आप उसे अपने साथ काम पर ले जाओगे और वो पैसे कमाने लगेगा तो ये आपकी गलत सोंच का परिणाम होगा, की आप आज भी पिछड़े और गरीब बने हुए हैं! अगर आप अपने अधिकारों के लिए लड़ाई नहीं लड़ सकते तब तो यह और भी बुरा है और अन्याय है डॉ. अम्बेडकर द्वारा आजीवन लड़ी जाने वाली उस लड़ाई के साथ जो आप जैसे ही लोगों के लिए थी! आप गरीब हैं, आपको खाना मुफ्त में मिल रहा है.....अब आप कहे की कोई इसे हमारे मुंह में नहीं डालता तब तो वाकई यह खाना आपको कभी नसीब नहीं होगा!..... मेहनत आपको करनी पड़ेगी उसे उठाने की, कोई आपको ऐसा करने से रोकता है तो आपको लड़ना पड़ेगा.....आज फिर किसी अम्बेडकर के इंतज़ार में हैं तो आपका भला हो चुका जितना होना था......

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

मित्र, जब हम पूरे समाज के सामने किसी ऐसे मुद्दे पर बात करते हैं जो बहुत बड़े वर्ग से जुड़ा हो तो जहां तक हो सके उसमे हमें व्यापक उदाहरण प्रस्तुत करने पड़ते हैं और विस्तृत आंकड़े देने पड़ते हैं! ऐसा नहीं है की भेदभाव का शिकार मैं नहीं हुआ या नहीं हो रहा, किन्तु मैं कुछ व्यक्तिगत घटनाओं से अधिक महत्व राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों को ही दूंगा....जिसे कोई झुठला नहीं सकता, मेरे व्यक्तिगत अनुभवों को तो लोग झूठ भी कह सकते हैं! अब बात रही आरक्षण की आवश्यकता की तो वह तो है ही, साथ ही आवश्यकता इस बात की भी है कि इसका क्रियान्वयन सही ढंग से हो, क्योंकि सही क्रियान्वयन के अभाव में एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे आज इसकी आवश्यकता है, वह इससे वंचित बना हुआ है! जितने सही ढंग से आज इसका क्रियान्वयन होगा, उतनी ही जल्दी कल इसकी आवश्यकता समाप्त हो जायेगी! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अनिल कुमार "पंडित" समीर खान, पहले आप मुझे यह बताएं की ये लेख दो लेखकों के परिश्रम का फल है या ये हिन्दू-मुसलमान के गठ जोड़ एक ही नाम है, अगर ये एक ही नाम है तो मुझे यह लिखने में कोइ गुरेज नहीं है की आप स्वयं विभिन्नताओं में एकता का प्रतीक हैं "राम रहीम " जैसे संत ! आपने आरक्षण पर एक सार गर्भित लेख लिखकर पाठकों के बीच बहश छेड़ दी है ! वैसे आपने लेख को सभी मुद्दों से जोड़कर कोई कोना खाली छोड़ा ही नहीं जिस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की जा सके ! आप स्वयं इस फिल्ड में एक जानी पहिचानी सक्षियत हैं और आपके लेख पर कोई प्रतिक्रिया देना ख़ास कर मेरे लिए आसान नहीं है फिर भी कोशीश कर रहा हूँ ! 'सविधान में विद्वानों ने जनता द्वारा दुद्कारे हुए पिछड़े वर्ग को उनकी आर्थिक और सामाजिक स्तर को सुधारने के लिए 'आरक्षण' की व्यवस्था की थी ! सविधान सभा के चेयरमैन बाबा डा0 अम्बेडकर थे जो खुद भी समाज के पिछड़े वर्ग से सम्बंधित थे, वे स्वयं भी नहीं चाहते थे की समाज के इस वर्ग को आरक्षण की वैशाखी दी जाय बल्की वे चाहते थे की इस वर्ग को शिक्षा का उचित अवसर देकर उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जाय ! यह जरूरी नहीं है की अपर क्लास में पैदा होने वाले सारे बच्चे होनहार प्रतिभावान ही हों ! पिछड़े वर्ग में भी अगर उन्हें शिक्षा का उचित अवसर दिया जाय तो फिर उन्हें आरक्षण रूपी वैशाखी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी ! राजनेताओं को, राजनीतिक पार्टियों को आरक्षण रूपी भट्टी में अपनी चपाती सकने का अवसर मिल रहा है ! इसीलिये वे समाज को तोड़ते जा रहे हैं आरक्षण रूपी हथियार का सहारा लेकर ! अनिल जी आप स्वयं जाकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उड़ीसा के अति पिछड़े इलाकों में जाकर देखें ! आरक्षण केवल उन्हीं लोगों को मिल रहा है जो राजनीति में दखल दे रहे हैं तथा राजनीति की चौसर पर अपनी गोटी बिठा रहे हैं ! जो असली हकदार हैं इस आरक्षण के वे तो आज भी सिरों पर गन्दगी धोने को मजबूर हैं ! आपको शायद बिल्डरों की गगन चूमती स्काई लार्क बिल्डिंगों में काम करने वाले लाचार मजदूरों को तो देखा होगा आपने, जेठ की दुपहरी में अपने नन्ने ननिहालों को एक बोरी के टाट में लपेट कर सडकों के किनारे छोड़ कर माँ बाप अपने कामों लग जाते हैं ! यहाँ तक की ८ साल पूरे होते ही उनके बच्चे भी माँ बाप का हाथ बटाते पत्थर तोड़ने में लग जाते हैं ! पंजाब में फसल के टाईम पर बिहार के बहुत सारे गरीब वहां मजदूरी करते मिल जाएंगे ! वे आज से ६५ साल पहले भी ऐसे ही थे और आज भी उसी हाल में हैं, क्या आरक्षण इस वर्ग के लिए नहीं है, अगर इन मजदूरों के बच्चों को शिक्षा का अवसर मिल जाय तो वे भी प्रतिभाशाली बन सकते हैं ! फिर ये आरक्षण की सुविधा कौन ले रहा है ! ये असली बहस का मुद्दा होना चाहिए !

के द्वारा: harirawat harirawat

अनिल कुमार जी, आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा. बहुत दिनों से इस समय का इंतजार था जब मैं मन में उठ रही हलचल को किसी सही जगह पर व्यक्त कर सकूं. आपके लेख के माद्यम से यह अवसर मिला. मैं झारखंड का एक आदिवासी हूँ. १५ साल दिल्ली में नौकरी करने के बाद अब वापस झारखंड में हूँ. मुझे जहां तक लगता है आरक्षण जरूरी है. आप लोगों ने पिछड़े समुदाय के लोगों के घरों में नहीं देखा है जिनको इस आरक्षण की जरुरत पड़ी. बगैर आरक्षण के वो शायद आपके सामने या बगल क्या, कहीं नजर ही नहीं आते. आप आरक्षण को इस नजर से देखें - एक पिता के दो बेटे थे. मरते हुए पिता ने जमीन के दो हिस्से कर दिए. बड़े को 75 प्रतिशत और छोटे को 25. बड़े को छोटे की जमीन से कोई मतलब नहीं, छोटे को बड़े की जमीन से कोई मतलब नहीं. बड़े के दो बेटे हुए, छोटे के भी दो बेटे हुए. दोनों ने अपनी-अपनी जमीन के 50-50 प्रतिशत अपने बेटों में बांटे. बड़े भाई के बेटों को छोटे भाई की जमीनों से कोई मतलब नहीं. मेरा कहने का उद्देश्य यह है कि इन्हीं जमीनों की तरह आरक्षण भी है. हमलोग आपकी जमीनों को नहीं ले रहे, उसपर कोई दावा नहीं कर रहे. हम हमारे (आरक्षित) इलाके में ही हैं. आप भी सिर्फ अपनी जमीन को देखें.  और प्रोन्नति पर आरक्षण वाली बात भी जरूरी है. यह तो आप भी मानते हैं कि अनुसूचित जाति या जनजाति के लोग ऊँचे पदों तक अभी भी नहीं पहुँच पाए है. आपने शायद वो डाटा कहीं से उठाया हो. पर ये मेरे अपने चाचाजी, मेरे भैया और बहन की ननद की कहानी है कि उनको कितने सालों और कितनी प्रोन्नति मिली. उनके अफसर हर बार उनके काम में कुछ न कुछ नुक्स निकाल देते थे. बहन कि ननद को दस साल हो गए जॉब करते हुए. अब वो मेनेजर बन पाई है और उम्मीद कर रही है कि इस साल शायद बोनस मिले. ये सब कोई मनगढंत कहानियाँ नहीं हैं, हकीकत हैं. मैं इंतजार कर रहा हूँ उस दिन का जब हम लोगों को आरक्षण की जरुरत बिलकुल नहीं पड़ेगी. उस समय को आने में कुछ वक्त लगेगा.

के द्वारा: ekaadivasi ekaadivasi

संतोष कुमार जी, आपकी बातों में थोडा सा विरोधाभास है....एक तरफ आप दलितों पर होने वाले अत्याचार को इतिहासकारों का सफ़ेद झूठ लिखते हैं दूसरी तरफ आप इतिहासकारों के इस वर्णन का समर्थन करते हैं की निम्न वर्ग के कई लोग राजा-महाराजा हुए हैं!......मानना है तो दोनों बातें मानिए अन्यथा एक भी नहीं, क्योंकि यह आवश्यक नहीं है की निम्न वर्ग के कुछ लोग किसी समय विशेष में तथा किसी क्षेत्र विशेष में राजा हुए तो बाकी समय, बाकी क्षेत्रों में दलितों पर अत्याचार नहीं हुआ, ज़रूर हुआ है और हैवानियत की हद तक हुआ है, सत्य-सत्य है जो ऑंखें बंद कर लेने से छिप नहीं सकता! आरक्षण ने किसी भी तरह भेद-भाव को बढ़ाया नहीं बल्कि कम किया है, क्योंकि इसी के चलते सामान्य वर्ग के लोग अब कहने लगे हैं की हम सब बराबर हैं, इसलिए आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए, और जिस इंसानियत और समानता की बात आप कर रहे हैं, उस पर कुठाराघात होने की एक नहीं कई-कई व्यक्तिगत यादें अभी तक हैं मेरे दिल-दिमाग में हैं साथ ही वर्तमान समय में भी यह पक्षपात जारी है! जो सामान्य वर्ग के लोगों की मानसिकता को दर्शाता हैं, किन्तु इन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ना ज़रूरी है.....ये लड़ाई समानता के लिए है कृपया इतिहास का, गांधी के अछूतों के उद्धार का, डॉ० आंबेडकर के संघर्षमय जीवन और उनके साथ हुए भेदभाव का अध्ययन कीजिये....उस समय समाज में आरक्षण नहीं था...धन्यवाद

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अनिल भाई, आपके विचार बेहद प्रखर हैं। कमलापति त्रिपाठी जब रेलमंत्री थे उस समय मोटी तनख्वाह होने के कारण सफाई कर्मचारी के पदों पर सवर्णों का कब्जा हो गया था। आज भी वे वाल्मीकि समाज के लोगों को अपनी जगह सफाई के लिए मामूली मेहनताने पर भेजकर खुद मौज काट रहे हैं। क्या सफाई कर्मचारियों के मामले में भी अनुसूचित जाति के लोगों में योग्य नहीं मिले थे, जिसकी वजह से यह तकलीफ सवर्णों को करनी पड़ी। शायद इसका जवाब सामान्य जाति के लोग नहीं दे पाएंगे। सामान्य जाति के लोगों द्वारा जहां तक योग्यता की बात करने का प्रश्न है उनकी ४० और ५० साल पहले की शिक्षण संस्थाओं का हाल देखें। इसमें जातिवाद के नाम पर उन्होंने अपने ही समाज के योग्य लोगों को दरकिनार कर लफंगों और मूर्खों को शिक्षक का तमगा देने का काम किया है। उन्हें अपने समाज तक में योग्यता पसंद नहीं है तो दूसरी जगह योग्यता की बात करने का उन्हें क्या अधिकार है। सवर्ण समाज के जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों को नैतिकता, योग्यता और संवेदना के सवाल तभी याद आते हैं जब उनके अधिकारों का विकेंद्रीकरण हो। मंडल आयोग की रिपोर्ट के विरोध में दो-तीन दर्जन उनके लड़कों ने आत्महत्या कर ली तो यह संवेदना का सबसे बड़ा मुद्दा हो गया, लेकिन अगर दुराग्रह में आत्मघात करना ही मानवीय संवेदना के लिए सबसे बड़ी ललकार है तो कश्मीर के मुजाहिदीन भी उनकी हमदर्दी के हकदार होने चाहिए जो कि किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं एक उसूल के लिए फिदाईन बने हुए हैं। भले ही उनका वह उसूल हमारी राष्ट्रवाद की परिभाषा के सांचे में फिट न बैठता हो। इस मामले में समय-समय पर चर्चा होती रहेगी। फिलहाल तो आपको निर्भीक पोस्ट के लिए बधाई...

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

आदरणीय अनिल जी ,..सादर अभिवादन शायद आपको पहली प्रतिक्रिया दे रहा हूँ ,..आपके नाम से एक तांत्रिक की याद आ गयी जिनका वर्गीकृत प्रचार अक्सर अखबार में दिखता था (सब लाइलाज परेशानिओं का आख़िरी इलाज !....पंडित समीर खान )....[यह बात विशुद्ध विनोद में कही है कृपया किसी तरह से अन्यथा मत लीजियेगा ] आरक्षण पर आपका लेख बहुत विचारशील और प्रभावी है ,...यह बात बिलकुल मानने योग्य नहीं है कि दलितों पर हजारों साल अत्याचार हुआ है ,यह इतिहासकारों का सफ़ेद झूठ है ,.....इतिहास गवाह है कि तमाम दलित(शायद तब नहीं) योद्धा ,राजा ,सामंत होते रहे हैं ,.. विदेशी आक्रमणों के साथ हमारी संस्कृति में गिरावट आई फलस्वरूप सामजिक पतन और अत्याचार हुए हैं ,...दूसरा आरक्षण अपने मकसद को पूरा भी नहीं कर सका और समाज में दूरी बढ़ने का कारण बना ,...मेरे विचार से अब जातियों को समाप्त कर वर्ग आधारित व्यवस्था बनानी चाहिए ,..सब मुसीबत की जड़ गरीबी है ,...उसे दूरकर सभी विसंगतियों से पार पाया जा सकता है ,.... आपने कोष्ठक में विशेष लाजिमी प्रश्न किया है अतः मेरा कहना है कि हाँ हम सामान होना चाहते हैं ,..किसी आरक्षण के लिए नहीं बल्कि समान इंसानियत के लिए ,...यही सही रास्ता होगा ,...सामान और भारतीय शिक्षा के बिना भी समानता दूर की कौड़ी होगा ,...मंजिलें बहुत हैं ,..रास्ता एक है ,..उसीपर सबको चलना होगा ,.. बढ़िया पोस्ट के लिए सादर हार्दिक आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

अब बात यह उठती है कि क्या वाकई इस आरक्षण का फायदा उस विशिष्ट वर्ग को मिल रहा है, जिसके लिए इसे संविधान द्वारा लागू किया गया था? नहीं….उस स्तर का सुधार नहीं हुआ है जिस स्तर का सुधार होना चाहिए था क्योंकि इसे लागू करने वाली सात्ताधारी दल ने कभी भी इसे पूरी निष्ठां एवं ईमानदारी से लागू करना ही नहीं चाहा, बस इसे एक लौलीपौप बना दिया गया तथा इसे हर बार चुनाव आने से पहले उस वर्ग को के सामने इसे चांटने के लिए रख दिया जाता है जिससे कि यह सम्बंधित है! गौरतलब है की आरक्षण की व्यवस्था को संविधान में डॉ० आंबेडकर द्वारा शुरुवाती 10 -15 वर्षों के लिए ही रखा गया था, क्योंकि उनके अनुसार यदि इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू किया जाता तो शुरू के 10 -15 वर्षों में ही असमानता समाप्त हो जाती! किन्तु वह कौंग्रेस जो आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों को दिए जाने वाले विशिस्ट चुनाव के अधिकारों के विरोध में थी तथा जिसके विरोध में गांधी ने आमरण अनशन किया! जिससे डॉ० आंबेडकर तथा दलित समाज ने अपने विशिष्ट चुनाव के अधिकारों का त्याग कर दिया! वही कौंग्रेस बाद में आरक्षण को हनुमान की पूंछ की तरह लंबा करते रहने में ही अपनी भलाई देखने लगी! इससे अधिक इस स्वार्थी दल की क्या पोल खोली जाए! इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में इतनी खामियां रही की कभी भी इसका पूरा फायदा उस वर्ग को नहीं मिला जिसके लिए इसकी व्यवस्था की गयी थी! इसी का परिणाम है कि आज़ादी के बाद 65 वर्ष गुजर गए लेकिन आरक्षण की वह व्यवस्था जिसे मात्र 10 -15 वर्षों में समाप्त हो जाना चाहिए था, आज भी बनी हुयी है ! लेकिन यह तो स्पष्ट है कि इसका कुछ फायदा ज़रूर उस वर्ग को मिला है जिसके लिए यह थी! तभी आज बाकी वर्ग की ज़्यादातर जनसँख्या यह कहने लगी है कि अब भेदभाव नहीं रह गया है सभी बराबर हो गए हैं तथा जो आरक्षण है उसका सही फायदा अब उस वर्ग तक नहीं पहुँच रहा है जिसके लिए यह है, इसलिए अब आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए!……सही बात है आरक्षण का ज़्यादातर फायदा उस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है जिसे यह मिलना चाहिए था! किन्तु फिर भी इस आरक्षण के चलते बहुत से पिछड़े वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है! हाँ इस व्यवस्था का कुछ दुरूपयोग भी हुआ है! लेकिन भईया ये कौन सी अनोखी बात है? भारत में तो प्रत्येक क्षेत्र ऐसा ही है जहाँ जो व्यवस्था जिसके लिए की जाती है, उस तक उस वयस्था का मात्र 5 -10 प्रतिशत ही पहुँचता है बाकी सब घपलों और घोटालों या कमीशनखोरी में चला जाता है! अब क्या आप कहेंगे की समस्त योजनायें बंद कर दो क्योंकि उसका सही हक उसके सही हक़दार तक नहीं पहुँच रहा! तब तो समस्त योजनाये रुक जायेंगी! इसलिए आवाज़ तो ज़रूर उठाइये लेकिन जो लोग गलत कर रहे हैं उनके खिलाफ, न की किसी ऐसी विशिष्ट योजना के खिलाफ जिससे कुछ हक़दार लोगों का भला हो रहा, लेकिन उसमे अन्य व्यक्तियों की वजह से खामिया आ गयी हैं, उसमे भी बड़ी लापरवाही शासन की तरफ से ही की जा रही है! आपका आधा लेख मैंने कॉपी कर दिया क्यूंकि मुझे लगा की आपके विचार इतने सटीक है की मैं अगर अपनी तरफ से कुछ कहूँगा तो उनकी शोभा बिगड़ जाएगी ! मेरे लिए कुछ कहना बाकी ही नहीं रखा आपने

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

सादर नमस्कार! सार्थक और विचारणीय प्रशन उठाया आपने है........................परन्तु जाति विशेष की बात न करते हुए मैं मानव स्वभाव की बात करना चाहूँगा.....जिसके कारन हरेक व्यक्ति अपना और अपने समुदाय का भला चाहता है............ तो इस आधार पर मैं कहना चाहूँगा कि शिक्षा और सर्विस के क्षेत्र में सवर्ण जातियों का दबदबा और संख्या दोनों ही अधिक था जिसके कारण दलित और पिछड़ा वर्ग हरेक जगह पिछड़ते गए...अतः इस गैप को ख़त्म करने के लिए................आरक्षण लाया गया................! जिसके कारण अब स्वर्ण जाति के अधिकारों का हनन होने लगा.......अतः दोनों ही परिस्थितियां मानवीय विकास के लिए हानिकारक साबित हुई.................क्योंकि इससे चारो तरफ असंतोष ही फैला............! इन समस्याओं का समाधान तब तक संभवा नहीं है जब हम इसका समाधान मानसिक और मानवीय स्तर पर तलाश किया जाय..............आज भी सबसे अधिक जमीं, नौकरियां, पूंजी और सत्ता कुछ विशेष जातियों के पास ही संरक्षित है...................जो हरेक जगह और हरेक डिपार्टमेंट में स्पष्ट दीखता है....................मैं तो कहता हूँ.................कि सब कुछ ख़त्म करके सभी में सामान रूप से सब कुछ वितरित किया जाय.......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय महिमा जी, आपकी प्रत्येक बात से मैं सहमत हूँ, मैं मानता हूँ की ज़्यादातर मामलों में मुस्लिम वर्ग आवश्यकता से अधिक कट्टरता दिखाता है, किन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की इस कट्टर सोंच को बढ़ावा देने के पीछे स्वार्थी राजनीति का भी अहम् रोल है, नहीं तो कोई भी वर्ग सरकार-प्रशाशन से ऊपर नहीं जा सकता, हमारी बेकार की शिक्षा-प्रणाली भी हमें इस कट्टरता की और ले जाती है....आज भी कई स्कूल विशिष्ट रूप से हिन्दुओं की शिक्षा और मदरसे मुस्लिमों की शिक्षा के लिए चलाये जा रहे हैं....हम आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं की वहां कौन सी शिक्षा दी जाती होगी! किसी भी वर्ग का इंसान न कोई धर्म लेकर पैदा होता है, न कोई जाति, उसे इन सब बातों का ज्ञान यहाँ इस धरती पर उसके आने के बाद उसके परिवार और समाज सवार करवाया जाता है.....दोषी तो समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग है...हाँ मुस्लिम वर्ग जैसी कट्टरता अन्य वर्गों में यदा-कदा ही देखने को मिलती है! इसे बढ़ावा देने वाले हमारे नेतागण हैं !

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

नमस्कार समीर जी , इतिहास गवाह है ... इस्लाम के अनुयायिओं ने पुरे विश्व में Muslim brotherhood के अलावा किसी चीज को अपना नहीं मानते और इसे फ़ैलाने के लिए हर कुकर्म करने पे आमदा रहते है ... और इसका ताजा प्रमाण अमर शहीद स्मारक का तहस नहस करना वो भी रमजान के महीने में ....... आप किनसे इंसानियत , देश और अन्न की बात कर रहे हों ये तो भगवान् बुध की प्रतिमा भी पुरे विश्व के मीडिया के सामने हथोडो से तोरते है ( तालिबान में ) .. नादिरशाह के ये वसंज भले नहीं हो पर आज के आधुनिक मुसलमान उसी इस्लामिक झंडे तले खड़ा है आधुनिक विनाशकारी यंत्रो के साथ विध्न्वास्क मानसिकता से लैस ........ इसके उदाहरण मुझे नहीं लगता देने की जरुरत है ....आप world trade centre, या संसद पे हमले की साजिस रचने वाला शख्स .. एक इंजिनीयर है तो दूसरा प्राध्यापक ... इनकी शिक्षा भले ही आधुनिक हो पर मानसिकता वही कबीलाई संस्कृति की .... जो देश और इंसान इस्लाम को नहीं मानता उसे समाप्त कर दो , या जबरन धर्म परिवर्तन कर दो ... उनकी धार्मिक सथालो को नेस्ताबुत कर दो ........ जन्हा इनकी संख्या कम होती है वंहा धीरे -२ अपनी संख्यां बढ़ाते हैं और फिर ... अपना असली रंग दिखाते है .. इसका ताजा उदहारण है असाम ...... जरुरत है सख्त और कुशल राजनितिक नेत्रित्व की .. जिसकी कमी हमेशा से भारत को रही है .... आपने महत्वपूर्ण चर्चा शुरू की है .... बधाई आपको

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

भाई अनिल जी, आपके लगभग सभी आलेख मानवीय होते हैं और यह मेरी पसंद की श्रेणी में आते हैं। मैं आपके आलेखों में अपने आपको पाता हूँ। सच कहूँ तो उन्हीं में खो जाता हूँ। आप जैसी विचारधारा वाले लोग, मेरी नजर में बहुत ही सम्मानीय होते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि जिस तरह की हिंसा असम में फैलाई  जा रही है, वह सुनियोजित राजनैतिक हिंसा होती है। कुछ सत्ता लोलुप नेता या दल ऐसा करते हैं। भारत एवं पाकिस्तान के बटवारे  का भी यही कारण था। सब जानते हैं कि जिन्हा धार्मिक नहीं था, अपितु नेहरू जी की तरह नास्तिक ही था। लेकिन सत्ता की लालच  ने उसने मजहब का सहारा लिया। अगर नेहरू जी केवल दो वर्ष के  लिये प्रधानमंत्री का मोह त्याग देते तो शायद भारत का बटवारा नहीं होता। मेरा यह भी मानना है कि  मजहब हमें सिखाता आपस में बैर रखना। मुझको नहीं है भाता ये धार्मिक बनना। अनिल जी यदि आप जैसी विचारधारा के लोग धरा पर न होते तो शायद मानव न जाने कब की विलुप्त हो जाती। आपकी सोच को नमन......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

चन्दन जी, वाकई समाज अच्छे और बुरे लोगों से मिलकर बनता है और बुरे लोगों की बुराई सभी करते हैं, इस लेख में सिर्फ किसी चारित्रिक रूप से गिरी हुयी स्त्री की बुराई नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की बुराई है जो उस स्त्री के कर्मो को पसंद करते हुए स्वयं भी चारित्रिक रूप से गिर रहा है तथा उस सरकार की भी बुराई है जिसे योग सिखाने वाले आयुर्वेदाचार्य के भारतीय नागरिकता ग्रहण करने पर कष्ट है क्योंकि वे ऐसे संगठन से जुड़े हैं जो उस सरकार की भ्रष्टाचार एवं महंगाई के कारण बुराई कर रहा है किन्तु जिस सरकार को चारित्रिक रूप से गिरी हुयी स्त्री को भारतीय नागरिकता देने में कोई हर्ज़ नहीं हुआ, रही सम्मान की बात तो आज भी आधे से ज्यादा लोगों को न्याय नहीं मिलता इसका मतलब ये नहीं की उनके गलत कार्यों की आलोचना न की जाए....सनी लियोने की तुलना अन्य भारतीय स्त्रियों से तो बिलकुल भी मत कीजियेगा, क्योंकि आज भी भारत की ज़्यादातर स्त्रियाँ चारित्रिक रूप से बहुत मज़बूत हैं बजाय यहाँ के पुरुषों के, किन्तु जिस तरह आज का परिवेश कुछ सनी जैसी स्त्रियों और बहुत सारे पुरुषों द्वारा गन्दा किया जा रहा है वह निंदनीय है और इसे किसी भी कारण से सही नहीं ठहराया जा सकता........आपके पास और कोई तर्क हो तो ज़रूर रखियेगा! प्रतीक्षा में...

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अनिल सर,सादर अभिवादन , ये हकीकत हैं की पिछले कुछ माह से [खासकर सन्नी के आगमन से]देश में छेड़खानी ,बलात्कार की घटनाओं में बहुत तेजी आई हैं |पूरे देश में हर दिन नकारात्मक खबरों से अखबार भरे रहते हैं ......... छोटे बच्चे जिज्ञासु होते हैं ...वे हमेशा खोजबीन करते रहतें हैं ....आज माँ बाप के पास समय नही हैं ,किन्तु बच्चो के पास नेट हैं |अधकचरा और निम्न स्तर की जानकारियाँ आसानी से पा जातें हैं | सुबह उठते ही अखबार पढ़ने की आदत होती हैं लोगों में ..जब मन की दिन भर प्रोग्रम्मिंग करना होता हैं उस समय चोरी हत्या बलात्कार की खबरे पढते हैं |रात को टीवी से ट्यूशन लेके सो जाते हैं ................... किसी लड़की से छेड़खानी होती हैं तो ...छेड़खानी करने वाले के माँ ,बाप ,मीडिया,..दोस्त ....आसपास का माहौल , आंतरिक आत्मबल ....शिक्षक तक कहीं ना कहीं से दोषी हैं |

के द्वारा: ajaykr ajaykr

आदरणीय समीर जी, सादर ! प्राचीन काल में जब सरकारें नहीं थी, तब समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए कुछ नियम क़ानून बनाए गए, और वे सर्वमान्य हों, इस के लिए उन्हें धर्मों से जोड़ दिया गया ! आज विज्ञान तरक्की कर गया है, और हम जानते हैं की ज्वालामुखी क्यों फटता है, बाढ़ क्यों आती है, बीमारियाँ क्यों फैलती हैं वगैरह-वगैरह ! पर उस समय मानव मष्तिस्क इतना विकसित नहीं था ! उस समय प्रत्येक घटना को ईश्वर या किसी न किसी देवी देवता से जोड़कर देखा जाता था ! लोग छोटे-छोटे समूहों में ही रहते भी थे ! दस-बीस-पचास किलोमीटर के दायरे में ! उस समय यह व्यवस्था उनको संयमित रखती थी ! धीरे-धीरे दायरा बढ़ा, और इसी के साथ किसी समूह द्वारा अपनाए गए नियमों या धर्मों के ज्यादा से ज्यादा अनुयायी बढ़ाने की प्रवृति भी बढ़ी ! जो कुछ कमी-बेसी के साथ आज भी विद्यमान है, यद्यपि की आज उसकी जरुरत नहीं है ! वर्तमान में धर्मों को लेकर जो दंगे- फसाद होते हैं वे तो संकुचित विचारधारा वाले लोगों की विकृत मानसिकता है ! वास्तव में धर्म का दायरा बहुत विस्तृत है ! धर्म के रूप भी बहुत हैं ! पारिवारिक धर्म ! सामजिक धर्म ! राष्ट्र धर्म ! आपद धर्म ! वस्तुतः आज इन धर्मों की नए सिरे से व्याख्या की जानी चाहिए ! इस कार्य में जितनी ही देर होगी, इसका स्वरुप विकृत होता चला जाएगा ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

"ये वक़्त सिर्फ बोलने का नहीं करके दिखाने का है….हम सभी को अपनी आने वाली पीढ़ी के नामों के आगे से ये जाती सूचक शब्द हटाने होगे तभी यह जातिगत भेदभाव समाप्त हो पायेगा !" सही कहा है आपने इसकी शुरुआत मैं कर चुका हूँ मैंने अपने ११ माह के पुत्र का नाम "प्रसून कृषिवाला" रखा है जबकि शायद अगर मेरे परिवार कि चलती तो आज उसका नाम "प्रसून वर्मा" होता .......मेरे घर में खेती होती है जिसका "कृषि" शब्द ही इसकी उत्पति का कारण है .......मैं अपने बेटे को इतना सशक्त बनाऊंगा कि उसे कभी आरक्षण कि आवश्यकता न पड़े .....ज्यादा नहीं कहूँगा ....वर्ना वो खुद कि पीठ थपथपाने वाली बात हो जायेगी! बहुत ही सही मुद्दा है आपका ........वास्तविकता यही है कि कम पढ़े लिखे लोगों कि अपेक्षा आज जातिवाद पढ़े लिखे लोगों में ज्यादा घर करके बैठा है !!

के द्वारा: AMIT VERMA AMIT VERMA

अनिल जी, आपके विचार क्षोभ, आक्रामकता और मार्मिकता से लैस हैं। कटु होते हुए भी आपने जो कहा वो एकदम सत्य है। जातिगत पहचान के कारण भारत में लोग नैतिकता, मानवता सब कुछ भूल जाते हैं। अंग्रेज विदेशी थे और घोषित रूप से इस देश को अपना उपनिवेश बनाकर यहां के संसाधनों को लूटकर इंग्लैंड को समृद्ध बनाने का काम कर रहे थे। फिर भी उन्होंने प्रयास किया कि यहां के लोगों को पढ़ने-लिखने का अच्छे से अच्छा मौका मिले. दूसरी ओर भारतीय संस्कृति है जिसने अपनों के लिए ही शिक्षा और उन्नति के सारे दरवाजे बंद कर दिए। यहां के लोगों को कब समझ में आएगा कि सभ्य होने का दावा करने का मतलब है जो लोग पिछड़े हैं, संस्कृतिकरण से वंचित हैं उन्हें भी उन्नति का अवसर देना सभ्य समाज और व्यक्ति की इस प्रवृत्ति का निर्वाह करते हुए ही अंग्रेजों ने लूटने और देश को अपनी दासतां में जकड़े रखने की भावना रखते हुए भी भारतीय मेधा को दुनिया की अच्छी से अच्छी यूनीवर्सिटी में पढ़ने का अवसर देना गवारा किया। हमने अपने ही दबे-कुचले भाइयों को ज्ञान की एक झलक भी उनके हिस्से में न आने देने के लिए यह व्यवस्था की कि अगर अमुक वर्ग धार्मिक ग्रंथों की एक भी पंक्ति सुन लेने का दुस्साहस करेगा तो उसकी सजा उबलता हुआ सीसा कानों में डालकर हमेशा के लिए उसकी श्रवण शक्ति समाप्त करना होगी। ऐसी बर्बर परम्परा और व्यवस्था का प्रवर्तन करने के बावजूद हम सर्वश्रेष्ठ और सभ्य होने का दावा करें इससे बड़ी धृष्टता कोई दूसरी नहीं हो सकती।

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

प्रिय अनिल जी, यह सब अज्ञान के कारण है। केवल बडी बडी शैक्षिक उपाधियों से, अथवा ऊंचे ऊचे पदों से कोई ज्ञानी नहीं होजाता है । ज्ञान का साक्षात्कार करना है तो स्वामी विवेकानन्द अथवा उन जैसे महान व्यक्तित्वों के विचारो में कीजिये । स्वमी विवेकानन्द ने शिकागो की विश्व धर्म महासभा मे भाषण देते हुए उपनिषद से एक श्लोक प्रस्तुत जिसके अर्थ थे - जैसे विभिन्न नदियां भिन्न स्त्रोतो से निकल कर समुद्र में मिल जाती हैं । उसी प्रकार हे प्रभो भिन्न भिन्न रुचिके अनुसार विभिन्न मार्गों द्वारा जाने वाले अन्त में  तुझ में ही मिल जाते हैं ।- ऐसे महापुरुषों की प्रेरणा और स्नेह से ज्ञान की ज्योति जलाए रखिये । एक  दिन उजाला होगा।

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

धर्म का असली मतलब कितने लोग समझते हैं? पहले इसको जानना होगा और धर्म की परिभासा क्या है क्या धर्म को हिन्दू ,मुस्लमान,सिख ,ईसाई के रूप में ही जाना जा सकता है ये सारे धर्म मानव निर्मित हैं जो समाज को तोड़ने का ही काम कर रहें हैं जबकि धर्म जोड़ने का काम करता है और सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है जिसको कोई नहीं कबूलता आज की तारीख में, और रही सही कसर मुल्ला , पंडित ,ग्रंथि और पादरी पूरा कर देते हैं पहले इन्सान तो बन जाये आज का आदमी धर्म की सोचना छोड़ देगा क्यूंकि "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना " और इस पर एक गाना बहुत पुराना गाया गया है "तू हिन्दू बनेगा न मुस्लमान बनेगा इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा " लोग इस बात को, इस भावपूर्ण गाने का मतलब समझ लेते तो यूँ इन्सान से हैवान न बनते और समाज में प्रेम भाईचारा का माहौल बनता अतः आज अच्छी बाते किसी के गले नहीं उतरती हैं और बात बात पर लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हो रहें हैं और इसको बढ़ावा देने में हमारे देश के राजनेता पूरे जोर शोर से लगे हैं अब जनता को धर्म का मतलब खुद तलाशना होगा और सिक्छा की कमी ही इस बुराई की जननी है बहुतेरे लोग अभी भी अन्धविश्वासी और अनपढ़ हैं यही कारन है धर्म के नाम पर लोग आपस में एक दुसरे से दूर होते जा रहे हैं . एक अच्छा लेख धन्यवाद

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

प्रितिश जी ना मै उस संसार से भिन्न हूँ जहाँ स्त्रियाँ अपने पतियों को झूठे इलज़ाम मे जेल भिजवा देती हैं, या उन्हें अन्य प्रकार से मानसिक रूप से प्रताड़ित करती हैं….. ना ही मै उस संसार से भिन्न हूँ जहां पुरुष स्त्रियों पर अत्याचार करते हैं, उसकी जिंदगी को नरक बना देते हैं, उसे अपाहिज बना देते हैं, या उसकी जिंदगी को ही समाप्त कर देते हैं….. किन्तु इन दोनों प्रकार की घटनाओ मे से आपको अधिक रोचक वे घटनाएं लगती हैं तथा आप उन घटनाओ को ज़रूर पढ़ते हैं (जैसा की आपने लिखा है) जिनमे एक पत्नी अपने पति के साथ बेवफाई करती है या उसको कष्ट पहुंचाती है…. भले ही अखबार मे ऐसी घटनाएं हफ्ते मे एक बार ही निकलती हो आपका ध्यान आकर्षित कर लेती हैं, किन्तु स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचार की घटनाएं आपका ध्यान आकर्षित नहीं कर पाती, (जबकि ऐसी घटनाएं प्रत्येक दिन के अखबार मे कम से कम एक और अधिक से अधिक ३-४ होती हैं…..) किन्तु आपकी नजरो मे नहीं चढ़ पाती क्योंकि आपके लिए ये सामान्य बात है….आज के ही पेपर मे पति द्वारा पत्नी का सर कुचलकर हत्या किये जाने की घटना है मेरा आपसे आग्रह है…..की आप दोनों प्रकार की घटनाओ की पेपर कटिंग करके रक्खे और कम से कम 15 दिन पश्चात दोनों प्रकार की घटनाओ की अलग-अलग गिनती करले, उसके बाद मुझे निश्छल होकर बताइयेगा की किस प्रकार की घटनाओ का कितना प्रतिशत है…. (मैंने किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया है, चाहे वो पति के द्वारा हो या पत्नी के द्वारा किन्तु मैंने उस हिंसा पर लिखा है जिसका प्रतिशत बहुत ही ज्यादा है, कम से कम 10 घटनाओं मे से 9 बार स्त्री ही पीड़ित की जाती है तथा रोज़ मर्रा की जिंदगी मे बहुत सी स्त्री शोषण की ऐसी घटनाएं घटती हैं जो सुर्ख़ियों मे नहीं आती घर की चार दिवारी के भीतर दब के रह जाती है. क्योंकि स्त्री जितना सहन कर सकती है पुरुष उसका १० प्रतिशत भी सहन कर ले तो बड़ी बात है…इसलिए पुरुषों पर होने वाले शोषण के मामले जल्दी ही घर के बाहर सुर्ख़ियों मे आ जाते हैं… किन्तु स्त्री अपना घर टूटने से बचाने का हर संभव प्रयास करती है और हिंसा सहती रहती है)

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

अशोक जी स्त्रियों की दुर्दशा के विषय मे आपने सही कहा, किन्तु स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु बन चुकी है इस कारण की जड़ पुरुष सत्तात्मक समाज और उसके बनाए हुए घटिया नियम, रीती और रिवाज़ रहे हैं…. रही बात धर्म और जाति अव्यवस्था के ख़त्म होने की तो उसके लिए तो अगर जल्दबाजी की गयी तो खून की नदिया बह जायेंगी और अगर धीरे धीरे सतत प्रयास चालू रक्खा गया तो शायद 100-50 साल और लग जाएँ या इससे भी ज्यादा, या शायद राजनीतिक वर्ग इसे ख़त्म होने ही ना दें…मैंने अपना नाम इसलिए नहीं बदला की मुझे उम्मीद है की मेरे नाम बदलने से ये कुप्रथा ख़त्म हो जायेगी बल्कि इसलिए बदला क्योंकि मै धर्म जाति अव्यवस्था मे विश्वास नहीं रखता…..हज़ारों अनाथ बच्चे जिनके माता-पिता का अता-पता नहीं है….क्या कोई माई का लाल उन्हें उनका धर्म या जाति बता सकता है?

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

धर्म और जाती केवल नाम रख लेने से या बदल लेने से अपने समाज में नकार दिया जाता तो जिस समस्या की आपने चर्चा की है वह सुलझने की और अग्रसर होती स्त्री हिन् स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन अपने समाज में है इस पर मैंने भी लेख लिखा था जिस पर कई महिलाओं ने इसपर आपत्ति जताई लेकिन यह एक कटु सत्य है और अपना समाज धर्म और जाती के रूप में इस कदर विभाजित है की सामाजिक सौहार्द्य जो समाज में होना चाहिए उसमे एक बाधक है अगर सामजिक सौहार्द्य होता तो अंतरजातीय विवाह होते जो की एक्का दुक्का हो भी रहें हैं ऐसा होने से दहेज़ जैसी कुप्रथा पर भी रोक लग पता और सारी तकलीफों का जड़ लड़कियों के लिए दहेज़ की जरुरत है वरना जरुर लड़कियां किसी लड़के से किसी मामले में कम नहीं हाँ उनकी शार्रीरिक बनावट भी उनपर होनेवाले अत्याचारों का मुख्य कारन है वर्ना आज कल लड़कियां पढाई में भी ओवल आ रही हैं चाँद पर जाने की छमता रखती हैं और उनकी तर्रकी रोज हो रही है जरुरत है उनको और सिक्छीत करने की और महिलाओं को और समझदारी बरतने की वर्ना कन्या को जन्म देनेवाली एक महिला ही है और वाही कन्या भ्रूण हत्या के लिए आगे होती दिखाई पड़ती है एक माता कैसे अपनी ही संतान का गला घोट सकती है यह घोर कलियुग की छाया ही कही जाएगी जो एक संकर्मित बीमारी कीतरह समाज में फैलती जा रही है जरुर इस गंभीर तथ्य पर विचार और चर्चा करने की जरुरत आज है एक अच्छा लेख लिखने के लिए आपको धन्यवाद और बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

रेखा जी मै यह नहीं कह रहा की पढ़-लिख कर नौकरी कर लेने से स्त्री को घरेलु हिंसा से मुक्ति मिल जाएगी, किन्तु जब स्त्री आर्थिक रूप से किसी और पर निर्भर नहीं रहेगी, तब कोई उसे अपनी बपौती नहीं बना सकेगा और स्त्री तब प्रत्येक परिस्थिति का अपने दम पर सामना कर सकने के काबिल होगी और हिंसा करने वाले को इस बात का एहसास करा सकेगी की यदि उसने ऐसा करना बंद नहीं किया तो वह इतनी लाचार नहीं है की उसकी गालिया सुने और मार खाए, बल्कि वह स्वयं अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर सकती है....तात्पर्य यह की स्त्री की मजबूत सामाजिक और आर्थिक स्थिति होगी तो इस तरह की घटनाओं में बहुत हद तक कमी हो जायेगी क्योंकि प्रत्येक पुरुष को एक स्त्री जीवन साथी की आवश्यकता होती है और वह नहीं चाहेगा की उसकी वह पत्नी जो उसका सदा ख्याल रखती है उसके आचरण की वजह से उसे छोड़ कर चली जाए....क्योंकि अब वह स्त्री मजबूर नहीं है और आर्थिक रूप से सशक्त है!

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

आलोक श्रीवास्तव का एक ग़ज़ल पढ़ने के बाद पिछले तीन दिनों से होश में नहीं हूँ.............इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप दोनों भी कुछ समय के लिए बेहोश हो जाये..............वैसे जनाब समीर जी, आपकी बाते सुनकर, मेरी बेहोशी और बढ़ गयी है पता नहीं सामने वाले का क्या हाल है.. सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के' जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के' तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: sunitashanoo sunitashanoo

के द्वारा: panditsameerkhan panditsameerkhan

यदि हम किसी व्यक्ति की मदद करने से पहले उस की कमियों या बुराइयों पर ध्यान देंगे तो कभी भी समाज-सेवा नहीं कर सकते” अब लिंगानुपात 2001 के 933 के बजाय 2011 में 940 हो गया है पर सच ये है की 6 साल से कम उम्र के बच्चों का लिंगानुपात जो 2001 में 927 था अब सिर्फ 914 रह गया है उत्तर प्रदेश में तो स्थिति और भी ज्यादा खराब है यहाँ शिशु लिंगानुपात 2001 के 916 की जगह सिर्फ 899 रह गया है! इससे साफ़ ज़ाहिर है कन्या भ्रूण हत्या घटने के बजाय बढ़ी है पंडित समीर खान साब , आंकड़ों के साथ आपने बेहतरीन प्रस्तुति दी है ! अगर आमिर खान का कार्यक्रम किसी बात को उठता है और अगर उनके इस प्रयास से हमें कुछ लाभ मिलता है तो मुझे नहीं लगता गलत है ! हालाँकि ये आमिर का प्रोजेक्ट है , जनसेवा नहीं किन्तु अगर ये अपना असर दिखता है तो अच्छा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

पवन जी, आपकी लेखनी और आपके विचारों को जवाब ढूंढ पाना बहुत कठिन है.....मेरे द्वारा लिखा गया ये लेख उतना बड़ा नहीं जितना बड़ा आपका कमेन्ट है.....कुछ जगहों पर आपकी बात मेरे विचारों से मेल खा जाती है तो कहीं आपकी गाडी और मेरी गाडी दो अलग अलग दिशाओं में दौड़ने लगती है...."बलात्कार" शब्द की गहराई को आपने जिस तरह से स्पष्ट किया है शायद ही कोई और कर पाता,आपके शब्द. "....ऐसा पुरुष ढूँढना मुश्किल है जो अपने जीवन मे कभी न कभी किसी स्त्री की ‘बलात्कार’ करने की बात न सोची हो। और, अगर किसी के मर्ज़ी के खिलाफ उससे संबंध बनाने का नाम बलात्कार है तो ऐसा पुरुष या स्त्री ढूँढना मुश्कील है जिसने कभी अपने पति या पत्नी के साथ बलात्कार न किया हो।....." पूर्ण रूप से सत्य हैं.....वहीँ दूसरी तरफ...."किसी भी एक घटना के लिए अपनी या किसी और की ज़िंदगी तबाह करना पागलपन है। जीवन अपने आप मे बहुत बड़ी बात है। बलात्कार की वास्तविक औकाद गुस्से मे मारे गए एक थपड़ से जियादा नहीं है। हो सकता है आपको मेरी बात समझ मे न आए, क्योंकि हमारी शिक्षा-दीक्षा ने हमरे अंदर सेक्स को लेकर एक विशेष नजरिया पैदा कर दिया है, लेकिन अगर आप शांत हो कर विचार करेंगे तो शायद समझ मे आजाए। मेरे ख़याल से ‘बलात्कार’ के लिए किसी व्यक्ति को सजा देना तो निहायत ही पागलपन है। अगर कोई व्यक्ति किसी का रेप करता है तो उसमे वह समाज जिसमे उसका दिमाग परिष्कृत हुआ है, उस व्यक्ति से कहीं अधिक जिम्मेवार है। वैसे भी सजा समाधान नहीं है, सजा से किसी भी समस्या का हल नहीं होता।"........आपके इन विचारों से मै अर्धसहमत हूँ.....बलात्कार की घटना को आप सिर्फ छणिक आवेश में मारे गए थप्पड़ से compare मत करें.....वाकई बलात्कार की कई घटनाएं छणिक आवेश में होती होंगी....किन्तु आज-कल जिस तरह से योजनाबद्ध तरीके से लड़कियों को कार में अगवा कर उनके साथ बलात्कार किया जाने लगा है.....बलात्कार के बाद हत्या कर देना जिस तरह से लगभग ३०-४०% मामलों में आम बात हो चुकी है......और अभी जल्द की ही घटना है जिसमे १० साल से कम उम्र के बच्चों के अनाथालय में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ वहां के उम्रदराज़ चौकीदारों द्वारा बलात्कार करने की घटनाएं सामने आई है.....सभी बहुत ही शर्मनाक है....आपकी बात यहाँ तक जायज़ है की सजा समाधान नहीं....किन्तु आपको इस बात का भी एहसास होना चाहिए की यदि हम बलात्कारियों को जेल की बजाये अस्पताल पहुंचाने लगे तो इस तरह की घटनाओं में कितना इजाफा हो जायेगा? पवन जी मै मानता हूँ कानूनी दंड के डर कोई भी अपराध पूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होगा किन्तु उसमे कमी ज़रूर होगी.....लेकिन जैसा आपने कहा उस से तो लोग आय दिन बलात्कार करके अस्पताल पहुँच जायेंगे अपना इलाज़ करवाने!.......इसके अलावा जैसा आपने कहा अपराधियों को हिकारत की निगाह से देखने के बजाय उनसे सहज और आम व्यवहार किया जाये....तो ऐसा होने पर तो इन घटनाओं में कम से कम चार्गुनी वृद्धि हो जाएगी.....क्योंकि कुछ so called शरीफ लोग समाज की और अपने घर वालों की नज़रों में गिरने से बचने के लिए ऐसे कृत्य नहीं करते!......And, there is no need to have any kind of attitude towards sex, neither for it nor against it. If you fight against nature, you are bound to go pervert. Naturally men are polygamous, and there is nothing wrong about it…..but to force people to live with one man or woman, is ugly….and is one of the prominent cause of perversion/rape..!.......you are right but your pleading for polygamy is not in the goodness of society because extreme freedom is as harmful as no freedom is.......if two person wants to live with each other without marriage then there is nothing wrong in it because it's their life.

के द्वारा: panditsameerkhan panditsameerkhan

हूँ....,  ‘बलात्कार’, कभी आपने इस शब्द की महिमा पर विचार किया है….. यह शब्द इस सदी के सबसे महिमावान शब्दों मे से एक है। कभी आपने गौर किया है कि….एक तरह का खीचाव है इस शब्द मे….इस शब्द को पढ़ के या सुन के ऐसे लगता है, जैसे यह शब्द आपको अपनी ओर खीचता हो। हमेशा से पुरुषों के के भीतर गज़ब का आकर्षण रहा है इस शब्द के प्रति, अगर आप पुरुष हैं तो इस बात को जानते होंगे। ऐसा पुरुष ढूँढना मुश्किल है जो अपने जीवन मे कभी न कभी किसी स्त्री की ‘बलात्कार’ करने की बात न सोची हो। और, अगर किसी के मर्ज़ी के खिलाफ उससे संबंध बनाने का नाम बलात्कार है तो ऐसा पुरुष या स्त्री ढूँढना मुश्कील है जिसने कभी अपने पति या पत्नी के साथ बलात्कार न किया हो। पुरुषों का सारा मज़ा जबरदस्ती मे है, ऐसे बहुत कम पुरुष मिलेंगे जो शादी के बाद भी foreplay जारी रखते है, afterplay तो बहुत दूर की बात है…., कौन पुरुष गरज मिट जाने के बाद फिकर करता है की उसकी शरीक-ए-विस्तर किस हाल मे है….. मैं ऐसे कई मित्रो को जानता हूँ जिन्होनों ने मुझसे कहा है कि उन्हे स्त्रियों या अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती संबंध बनाना अच्छा लगता है और उनका ऐसा करना उनकी स्त्रियों को भी रुचता है। आज पश्चिम मे sex orgy या group sex आम बात है। स्त्रियाँ के लिए एक पुरुषवादी(monogamy) होना अब बस पिछली सदी की बात रह गई है। वस्तुतः सेक्स अपने आप मे एक हिंसात्मक क्रिया है, The very act of sex is violent’. इसी लिए तो हम सैनिको को उनकी पत्नी से दूर रखते है, क्योंकि वो अगर अपनी हिंसा को सेक्स मे निकाल देंगे, तो फिर लड़ने मे उनका रस नहीं रह जाएगा। शायद आपने गौर नहीं किया हो, हमारे सारे हथियार का आकार पुरुष के लिंग जैसा होता है। लेकिन, हमारे लिए हम करते क्या है ये तो सवाल ही नहीं है, हमारे लिए ‘शब्द’ action से जियादा महत्वपूर्ण होता है,,,,हम करते क्या है वो महवपूर्ण नहीं है, नाम क्या देते उसको, ये जियादा महत्वपूर्ण है। एक तरफ हम, घिनौना से घिनौना काम हम अच्छे शब्दो की आड़ कर कर लेते है और दूसरी तरफ मामूली सी बात को बड़े बड़े शब्द दे कर जीवन से भी जियादा महत्वपूर्ण बना देते है। हमारा सारा खेल ही शब्दो का खेल हैं…..और यही खेल हमने ‘बलात्कार’ शब्द के साथ भी खेला है, ‘बलात्कार’ की घटना मे वो दंश नहीं जो ‘बलात्कार’ शब्द मे है….This word has great psychological impact on our mind….! We have made this word ‘बलात्कार’ sound much bitterer, than it deserves. किसी भी एक घटना के लिए अपनी या किसी और की ज़िंदगी तबाह करना पागलपन है। जीवन अपने आप मे बहुत बड़ी बात है। बलात्कार की वास्तविक औकाद गुस्से मे मारे गए एक थपड़ से जियादा नहीं है। हो सकता है आपको मेरी बात समझ मे न आए, क्योंकि हमारी शिक्षा-दीक्षा ने हमरे अंदर सेक्स को लेकर एक विशेष नजरिया पैदा कर दिया है, लेकिन अगर आप शांत हो कर विचार करेंगे तो शायद समझ मे आजाए। मेरे ख़याल से ‘बलात्कार’ के लिए किसी व्यक्ति को सजा देना तो निहायत ही पागलपन है। अगर कोई व्यक्ति किसी का रेप करता है तो उसमे वह समाज जिसमे उसका दिमाग परिष्कृत हुआ है, उस व्यक्ति से कहीं अधिक जिम्मेवार है। वैसे भी सजा समाधान नहीं है, सजा से किसी भी समस्या का हल नहीं होता। हमे जीवन को देखने के नज़रिया को बदलना होगा, अपराधियों की जगह जेल नहीं, हॉस्पिटल होनी चाहिए। उनका मनोवैज्ञानिक इलाज़ किया जाना चाहिए, और सिर्फ उन्ही लोगों का नहीं जिन्होने बलात्कार किया है बल्कि उनका भी जो ऐसा करने की सोचते है, क्योंकि जो आज सोचता है कल करेगा भी, बस मौका और थोड़ी सी हिम्मत की बात है। हमारे तथाकथित सरीफ लोग और अपराधी मे बस थोड़ी हिम्मत का फर्क होता है, बाँकी बुनियादी तौर पर दोनो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है। अपराधियों को हिकारत भरी निगाह से देखने की बजाय, उनके साथ सहज और आम इंसान की भाँति पेश आने की जरूरत है, उनका साधारण रोगी की तरह मनोवैज्ञानिक इलाज़ किया जाना चाहिए। समाज के कुछ नियमो मे भी बदलाव लाने की जरूरत है, एक से जियादा शादी करने की प्रथा को समाप्त की जानी चाहिए, प्रकृति एक पुरुष के लिए एक स्त्री को ही पैदा करता है……एक समय पर एक से जियादा स्त्री को रखना sexual perversion को बढ़ावा देना है। अगर एक अकेला आदमी तीन स्त्री को रखेगा तो जो बाँकी के दो पुरुष हैं वो बेचारे क्या करेंगे….। And, there is no need to have any kind of attitude towards sex, neither for it nor against it. If you fight against nature, you are bound to go pervert. Naturally men are polygamous, and there is nothing wrong about it…..but to force people to live with one man or woman, is ugly….and is one of the prominent cause of perversion/rape..! अगर दो व्यक्ति एक दूसरे से प्रेम करते है और साथ रहना चाहते है, तो उन्हे साथ रहने की पूरी स्वतंत्र मिलनी चाहिए, लेकिन किसी को भी किसी बंधन मे बांध कर किसी के साथ रहने के लिए मजबूर करना गलत है और ये बलात्कार या दूसरे प्रकार के पाखंडो को बढ़ावा देता है

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: shaktisingh shaktisingh




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