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नारी का जीवन-?????

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आज के आधुनिक युग में भी स्त्रियों की दुर्दशा और कन्या भ्रूण हत्या की घटनाओं को देखते हुए मुझे ये लेख लिखना पड़ रहा है….
प्रत्येक माता एवं पिता को संबोधित-
कितने आश्चर्य की बात है की नारी की कोख से ही जन्म लेने वाले स्त्री और पुरुष उसी स्त्री की दुर्दशा के लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं….और इससे भी अधिक आश्चर्य तब होता है जब एक स्त्री स्वयं दूसरी स्त्री को निकृष्ट समझने लगती है और उसके दुखों का कारण बनती है, दादी माओ को तो अक्सर ही पोती नहीं पोता चाहिए होता है, कभी कभी कुछ माएं भी लड़की नहीं लड़के की इच्छा रखती हैं…..बचपन से लेकर बुढापे तक अलग-अलग रिश्तों में एक स्त्री दूसरी स्त्री के दुखों कारण बनती है, कभी दादी-नानी के रूप में, कभी भाभी तो कभी नन्द के रूप में तो कभी कभी माँ के ही रूप में एक स्त्री दूसरी स्त्री के प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाती है और इन सबसे बढ़कर एक रिश्ता सास और बहु का जो एक-दुसरे के लिए बहुत ही बुरा साबित होता चला आ रहा है. …..क्या स्त्रियाँ यह बात भूल जाती है की वे स्वयं एक स्त्री हैं?
संभवतः ऐसा इसलिए होता है की भारतीय समाज में बचपन से प्रत्येक स्त्री और पुरुष के दिमाग में ये बातें ठूंस ठूंस कर भर दी जाती हैं की स्त्री सदैव पुरुष से निकृष्ट है और रहेगी चाहे वह जितनी ही साक्षर क्यों न हो जाए, चाहे कितनी ही ऊँची पोस्ट पर क्यों न पहुँच जाए…. भारतीय समाज में रचे -बसे रिति-रिवाज़ और संस्कार उसे कदम-कदम पर यह एहसास कराते रहते हैं की वह कुछ भी करले पुरुष वर्ग से श्रेष्ठ नहीं बन सकती क्योंकि श्रेष्ठता तो पुरुष वर्ग का जन्सिद्ध अधिकार है और दासता ही स्त्री वर्ग का जन्सिद्ध कर्त्तव्य है,…इसी वजह से अशिक्षित के अलावा कई सारी शिक्षित स्त्रियाँ भी इस मानसिकता से ग्रस्त हो जाती है की कुल का दीपक तो एक लड़का ही हो सकता है तथा लड़का ही उनके समस्त दुखों की दवा बन सकता है या उनके बुढापे की लाठी बन सकता है….क्यों क्या एक लड़की पढ़-लिख कर अपने माँ-बाप का नाम रोशन नहीं कर सकती और उनका सहारा नहीं बन सकती? शायद नहीं क्योंकि लड़की तो पराया धन होती है उसे विवाह के बाद अपने माँ-बाप से दूर जाना ही पड़ता है…किन्तु क्या आज के समय में यह बात प्रासंगिक रह गयी है? क्योंकि आज-कल के बेरोजगारी भरे दौर में जिसको भी जहाँ भी नौकरी मिलती है वह वहीँ चला जाता है चाहे वह लड़का हो या लड़की तो फिर कैसे लड़का माँ-बाप का सहारा बन सकता है और लड़की नहीं? दोनों ही दूर रहकर भी अपने माँ-बाप का सहारा बन सकते है यदि वे बनना चाहे तो…..
लेकिन शायद दहेज़ प्रथा भी इसका दूसरा प्रमुख कारण है….तो भैया यह बिमारी तो हम सभी की ही पैदा की हुयी है और यदि हम इसे ख़त्म करना चाहे तो ज़रूर ख़त्म कर सकते है…अपने लड़के और लड़कियों दोनों को पढाये और इस काबिल बनाये की वे स्वयं इतना कमाए की उन्हें दूसरों से कुछ भी लेने की आवश्यकता ही ना रहे…वैसे भी एक सामान्य शादी में 5 से 10 लाख रूपये दहेज़ में दिए जाते होंगे लेकिन यही लड़की स्वयं कमाए तो इतनी रकम तो वो शुरू के 5 -10 साल में ही कमा लेगी और उसके बाद न जाने कितना ज्यादा….फिर आप क्यों इस दहेज़ जैसी कुप्रथा को आश्रय दे रहे है जो ना जाने कितनी स्त्रियों के जीवन को बर्बाद कर चुकी है और आज भी स्त्रियों के लिए बहुत बड़ा अभिशाप बनी हुयी है…..मै ये उम्मीद पुरुष और स्त्री दोनों वर्गों से रखता हूँ की वे मेरी बात को समझेंगे और समाज में व्याप्त कन्या भ्रूण ह्त्या तथा स्त्री शोषण से जुडी कुरीतियों को समाप्त करने में अपना योगदान देंगे….
याद रखिये बेटियाँ अपने माँ-बाप को बेटों से कही ज्यादा प्यार करती है और उनकी ज्यादा सेवा करती है, एक सास को भी हमेशा ये याद रखना चाहिए की वह भी कभी बहु थी तथा बहु को याद रखना चाहिए की वह भी कभी सास बनेगी, प्रत्येक स्त्री के पास ऐसा दिल होता है जिसमे प्यार और त्याग की असीम भावनाए विद्यमान होती हैं और समझौते करने में स्त्रियों का कोई मुकाबला ही नहीं है तो फिर एक स्त्री दूसरी स्त्री से समझौता क्यों नहीं कर सकती…..
आगे का लेख प्रत्येक पति और पत्नी को संबोधित-
पुरुष भी मानव है, स्त्री भी मानव है, पुरुष भी प्यार चाहता है, स्त्री भी प्यार चाहती है, पुरुष को भी क्रोध आता है, स्त्री को भी क्रोध आता है, पुरुष को भी दर्द होता है, स्त्री को भी दर्द होता है, पुरुष भी गलती करता है, स्त्री से भी गलती होती है…..किन्तु
किन्तु क्यों ऐसा होता है की स्त्रियों द्वारा गलती किये जाने पर उनका पति उनकी पिटाई कर सकता है जबकि पति द्वारा गलती किये जाने पर कोई कोई ही पत्नी पति को उसकी गलती का एहसास कराने की कोशिश कर पाती है और उनमे से भी कइयों को उसका अंजाम उल्टा गालियाँ सुनकर या मार खाकर चुकाना पड़ता है?
ऐसा क्यों होता है? क्या किसी पुरुष ने कभी ये सोंचा है की गलतियां तो उससे भी हो जाती है और उसके द्वारा गलतियाँ किये जाने पर यदि उसकी पत्नी उसकी वैसे ही पिटाई करे जैसे की वह अपनी पत्नी की करता है तो शायद पति लोग अपनी पत्नियों को पीटना छोड़ दे, लेकिन अफ़सोस इस बात का है की ऐसा होने वाला नहीं क्योंकि भारतीय सभ्यता के अनुसार शादी करने के पश्चात गलतियों का पुतला पुरुष “पतिदेव” बन जाता है और देवता पर हाँथ उठाना तो दूर कई पत्नियां उससे बहस भी करना घोर पाप समझती हैं….किन्तु अगर कोई पत्नी हिम्मत करके बहस भी करले तो फिर उसे पतिदेव के कोप का भागी बनना पड़ता है क्योंकि पतिदेव भी उसी समाज का हिस्सा हैं जिसमे पुरुषों को स्त्रियों से श्रेष्ठ और पतियों को पत्नियों का परमेश्वर मानने का चलन है, बस इसी मानसिकता से ग्रस्त पतिदेव को तुरंत क्रोध आ जाता है और वो अपनी शारीरिक शक्ति का प्रयोग अपनी तुच्छ और कमज़ोर समझी जाने वाली पत्नी पर कर देते हैं…कई पति यह बोलेंगे के पत्नी गलती करती है तो फिर उसे पीटना ही पड़ता है तो भैया जब आप गलती करो तो अपनी पत्नी को बोलो की आप को गलती के अनुसार पीट कर सजा दे दे, लेकिन ऐसा तो आप नहीं करोगे, क्योंकि आपको सब छूट है आपकी पत्नी को नहीं….
एक बात और की जब कोई दूसरा गलती करता है तो हमें क्रोध आ ही जाता है फिर चाहे वो हमसे बड़ा हो या छोटा हो, हमारा बौस हो या नौकर, दोस्त हो या रिश्तेदार लेकिन हम पीटते सिर्फ अपने से कमज़ोर को ही हैं और अन्य कमज़ोर लोगो से लाख गुना ज्यादा अपनी पत्नी पर गुस्सा उतार देते हैं, क्यों? क्योंकि अब वो आप की बपौती बन गयी है, ज़्यादातर पत्नियां अपने पतियों से शारीरिक रूप में कम शक्तिशाली होती है इसलिए वे अपने ऊपर होने वाले अत्याचार को सहन करती रहती हैं…यही सहन करने की आदत पतियों को और हिंसा करने के लिए उकसाती है….एक कहावत भी है की हिंसा करने वाले से सहने वाला ज्यादा दोषी होता है….हाँ यह बात पूरी तरह से सत्य है….पत्नियां जब तक अपने विरुद्ध होने वाली हिंसा का ठोस जवाब नहीं देंगी उन्हें ये हिंसा सहनी पड़ेगी क्योंकि बहुत मुश्किल है की किसी पति देव की आँखे एक दिन अपने आप खुल जाएँ और उसे अपनी पत्नी के उस दर्द का एहसास हो जाए जो उसने ही दिया है लेकिन जिसे उसने स्वयं पर कभी महसूस नहीं किया…..
मेरा आग्रह ईमानदार पतियों से है की वे अपनी पत्नी को भी इंसान समझे और उसे उसके गलतियों के लिए वैसे ही समझाएं जैसे वे दुसरे लोगों को समझाते हैं….क्योंकि गलतियां सबसे होती है….और स्त्रियों अपने पति को पहले बात से समझाएं और उसे एहसास कराएं की वह भी गलतियां करता है और यदि उसने आपके विरुद्ध हिंसा का प्रयोग करना जारी रक्खा तो उसे उसका मुह तोड़ जवाब मिलेगा……लेकिन सबसे पहले स्त्रियों को स्वयं को एक जीवित एवं सम्मानित इंसान समझना पड़ेगा और पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खडा होना पड़ेगा तथा अपने और अपने परिवार का खर्च उठाने लायक बनना पड़ेगा!

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
28/06/2012

धर्म और जाती केवल नाम रख लेने से या बदल लेने से अपने समाज में नकार दिया जाता तो जिस समस्या की आपने चर्चा की है वह सुलझने की और अग्रसर होती स्त्री हिन् स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन अपने समाज में है इस पर मैंने भी लेख लिखा था जिस पर कई महिलाओं ने इसपर आपत्ति जताई लेकिन यह एक कटु सत्य है और अपना समाज धर्म और जाती के रूप में इस कदर विभाजित है की सामाजिक सौहार्द्य जो समाज में होना चाहिए उसमे एक बाधक है अगर सामजिक सौहार्द्य होता तो अंतरजातीय विवाह होते जो की एक्का दुक्का हो भी रहें हैं ऐसा होने से दहेज़ जैसी कुप्रथा पर भी रोक लग पता और सारी तकलीफों का जड़ लड़कियों के लिए दहेज़ की जरुरत है वरना जरुर लड़कियां किसी लड़के से किसी मामले में कम नहीं हाँ उनकी शार्रीरिक बनावट भी उनपर होनेवाले अत्याचारों का मुख्य कारन है वर्ना आज कल लड़कियां पढाई में भी ओवल आ रही हैं चाँद पर जाने की छमता रखती हैं और उनकी तर्रकी रोज हो रही है जरुरत है उनको और सिक्छीत करने की और महिलाओं को और समझदारी बरतने की वर्ना कन्या को जन्म देनेवाली एक महिला ही है और वाही कन्या भ्रूण हत्या के लिए आगे होती दिखाई पड़ती है एक माता कैसे अपनी ही संतान का गला घोट सकती है यह घोर कलियुग की छाया ही कही जाएगी जो एक संकर्मित बीमारी कीतरह समाज में फैलती जा रही है जरुर इस गंभीर तथ्य पर विचार और चर्चा करने की जरुरत आज है एक अच्छा लेख लिखने के लिए आपको धन्यवाद और बधाई

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    28/06/2012

    अशोक जी स्त्रियों की दुर्दशा के विषय मे आपने सही कहा, किन्तु स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु बन चुकी है इस कारण की जड़ पुरुष सत्तात्मक समाज और उसके बनाए हुए घटिया नियम, रीती और रिवाज़ रहे हैं…. रही बात धर्म और जाति अव्यवस्था के ख़त्म होने की तो उसके लिए तो अगर जल्दबाजी की गयी तो खून की नदिया बह जायेंगी और अगर धीरे धीरे सतत प्रयास चालू रक्खा गया तो शायद 100-50 साल और लग जाएँ या इससे भी ज्यादा, या शायद राजनीतिक वर्ग इसे ख़त्म होने ही ना दें…मैंने अपना नाम इसलिए नहीं बदला की मुझे उम्मीद है की मेरे नाम बदलने से ये कुप्रथा ख़त्म हो जायेगी बल्कि इसलिए बदला क्योंकि मै धर्म जाति अव्यवस्था मे विश्वास नहीं रखता…..हज़ारों अनाथ बच्चे जिनके माता-पिता का अता-पता नहीं है….क्या कोई माई का लाल उन्हें उनका धर्म या जाति बता सकता है?

sadhna srivastava के द्वारा
28/06/2012

समीर जी मैं सोचती हूँ जो हो चुका है उसमे कुछ नहीं किया जा सकता… लेकिन आज और आने वाले कल में हम बहुत सारे बदलाव ला सकते हैं…. हर व्यक्ति अगर अपना अपना घर ही ठीक करने लगे तो सब बदल जायेगा….. !! आपके लेख के लिए क्या तारीफ करूँ…. सच्चाई बयां की है आपने….. बस सुधार आ जाये….. उसी का इंतज़ार है…… !!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    28/06/2012

    आप सही कह रही हैं साधना जी, लेकिन हर व्यक्ति कभी किसी भी सामाजिक बुराई के लिए ना ज़िम्मेदार होता है, ना ही हर व्यक्ति उसे दूर करने का प्रयास करता है….हाँ ज़्यादातर लोग जिस तरह का आचरण करते हैं वही समाज का आचरण कहलाता है….शुरुआत आप जैसे बुद्धिजीवी ही करेंगे, तभी बदलाव आएगा!

pritish1 के द्वारा
27/06/2012

प्रभावी लेखन…….. किन्तु आप उस संसार से भिन्न हैं जहाँ एक पत्नी अपने सीधे साधे पति के जीवन को नरक बना देती है………आप उस संसार से भिन्न हैं जहाँ किसी की बेटी अपने परिवारवालों को धोखा देकर किसी के साथ भाग जाती है बहुत से ऐसे उदहारण है जो नारी की प्रतिष्ठा पर दाग लग जाता है………मैं समाचार पत्रों में ऐसे न्यूज़ सदैव देखता हूँ……. मेरी कहानी ऐसी ये कैसी तमन्ना है अवश्य पढें………मैंने इसके तिन भाग प्रस्तुत किये हैं…….आपके विचारों की प्रतीक्षा में…………

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    28/06/2012

    प्रितिश जी ना मै उस संसार से भिन्न हूँ जहाँ स्त्रियाँ अपने पतियों को झूठे इलज़ाम मे जेल भिजवा देती हैं, या उन्हें अन्य प्रकार से मानसिक रूप से प्रताड़ित करती हैं….. ना ही मै उस संसार से भिन्न हूँ जहां पुरुष स्त्रियों पर अत्याचार करते हैं, उसकी जिंदगी को नरक बना देते हैं, उसे अपाहिज बना देते हैं, या उसकी जिंदगी को ही समाप्त कर देते हैं….. किन्तु इन दोनों प्रकार की घटनाओ मे से आपको अधिक रोचक वे घटनाएं लगती हैं तथा आप उन घटनाओ को ज़रूर पढ़ते हैं (जैसा की आपने लिखा है) जिनमे एक पत्नी अपने पति के साथ बेवफाई करती है या उसको कष्ट पहुंचाती है…. भले ही अखबार मे ऐसी घटनाएं हफ्ते मे एक बार ही निकलती हो आपका ध्यान आकर्षित कर लेती हैं, किन्तु स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचार की घटनाएं आपका ध्यान आकर्षित नहीं कर पाती, (जबकि ऐसी घटनाएं प्रत्येक दिन के अखबार मे कम से कम एक और अधिक से अधिक ३-४ होती हैं…..) किन्तु आपकी नजरो मे नहीं चढ़ पाती क्योंकि आपके लिए ये सामान्य बात है….आज के ही पेपर मे पति द्वारा पत्नी का सर कुचलकर हत्या किये जाने की घटना है मेरा आपसे आग्रह है…..की आप दोनों प्रकार की घटनाओ की पेपर कटिंग करके रक्खे और कम से कम 15 दिन पश्चात दोनों प्रकार की घटनाओ की अलग-अलग गिनती करले, उसके बाद मुझे निश्छल होकर बताइयेगा की किस प्रकार की घटनाओ का कितना प्रतिशत है…. (मैंने किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया है, चाहे वो पति के द्वारा हो या पत्नी के द्वारा किन्तु मैंने उस हिंसा पर लिखा है जिसका प्रतिशत बहुत ही ज्यादा है, कम से कम 10 घटनाओं मे से 9 बार स्त्री ही पीड़ित की जाती है तथा रोज़ मर्रा की जिंदगी मे बहुत सी स्त्री शोषण की ऐसी घटनाएं घटती हैं जो सुर्ख़ियों मे नहीं आती घर की चार दिवारी के भीतर दब के रह जाती है. क्योंकि स्त्री जितना सहन कर सकती है पुरुष उसका १० प्रतिशत भी सहन कर ले तो बड़ी बात है…इसलिए पुरुषों पर होने वाले शोषण के मामले जल्दी ही घर के बाहर सुर्ख़ियों मे आ जाते हैं… किन्तु स्त्री अपना घर टूटने से बचाने का हर संभव प्रयास करती है और हिंसा सहती रहती है)

R K KHURANA के द्वारा
25/06/2012

प्रिय अनिल जी आपकी रचना बहुत अच्छी है ! देखना यह है की आप जैसे कितने युवक आगे आते है ! क्योंकि इस प्रथा को आप जैसे युवक ही ठीक कर सकते है ! अच्छा लेख.! हाँ आपका नाम कुछ अटपटा सा लगा ! पंडित भी और खान भी ?? राम कृष्ण खुराना

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    27/06/2012

    राम कृष्ण जी….जिस तरह आपने मेरा समर्थन स्त्री के विरुद्ध होने वाली कुप्रथा के विरोध स्वरुप किया उसी तरह आपसे यह आशा है की आप मेरा समर्थन धर्म और जाति के नाम पर मनुष्यों के होने वाले बटवारे के विरोध में भी करेंगे……आप जैसे अनुभवी इंसान को ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि आप इशारों को भी समझ सकते होंगे….मेरे एक और रचना है “मै कौन हूँ….कौन हो तुम” कभी इस पर भी नज़र डालियेगा!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    27/06/2012

    अजय जी…..यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है की मेरे इस लेख को आपने अपने साप्ताहिक mahabuletin में शामिल किया….मुझे निराशा तब होती जब आप इससे आर्थिक रूप से फायदा उठाते और मुझे मेरा हिस्सा नहीं देते….हा हा हा

yamunapathak के द्वारा
24/06/2012

कभी-कभी युवा बेटे ही दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए माँ का विरोध नहीं कर पाते,अब ना जाने इसमें माँ के प्रति सम्मान की भावना कहाँ ख़त्म होती है!!!!!!!!!!!! सभी युवाओं के लिए आपका यह ब्लॉग विचारणीय है पर इसका हल बहुत आसान है तब जब सभी युवा आप जैसी स्वस्थ सोच रख सकें. शुक्रिया अनिलजी.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    24/06/2012

    YAMUNA JI, प्रत्येक बुराई के पीछे समस्त लोगों की अलग-अलग रूप में कोई न कोई भूमिका रहती ही है उसी तरह स्त्रियों के विरुद्ध हो रहे प्रत्येक अपराध के पीछे समस्त लोग ज़िम्मेदार हैं… युवा वर्ग सर्वाधिक ज़िम्मेदार है क्योंकि उसके हांथों में ही देश का भविष्य है

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    24/06/2012

    डॉक्टर साहब बहुत अच्छी कविता है आपकी

allrounder के द्वारा
23/06/2012

नमस्कार अनिल कुमार जी, एक अच्छे और संदेशपरक आलेख पर बधाई आपको !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    24/06/2012

    नमस्कार allrounder ji बहुत बहुत शुक्रिया

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
23/06/2012

आदरणीय समीर जी, सादर बहुत ही प्रभावकारी लेख. बधाई समाज के प्रति आपकी चिंता मुझे आपकी ओर खींच रही है.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    23/06/2012

    प्रदीप जी सादर, बहुत बहुत शुक्रिया आपके विचारों द्वारा मेरे समर्थन के लिए

yogi sarswat के द्वारा
23/06/2012

पंडित जी नमस्कार ! विषय वस्तु का बहुत ही सुन्दर और सटीक विश्लेषण…… आपकी बातों से पूर्णतः सहमत…….बेहतरीन आलेख ! ऐसे लेख सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक लड़ाई को जन्म देते हैं ! बहुत सही और सटीक लेख

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    23/06/2012

    नमस्कार YOGI जी, समय की यही पुकार है की अब समस्त अत्याचारों का विरोध हो और सभी को सच में बराबरी का दर्जा दिया जाए….

चन्दन राय के द्वारा
23/06/2012

मित्रवर , आपके विचारों का स्वागत और सम्मान , शब्दश सहमत , आज आवश्यता है की हर स्त्री पुरुष अपने सोच में ये बदलाव लाये !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    23/06/2012

    सही बात है चन्दन भाई, ये बदलाव सभी को अपनी सोंच में लाने ही चाहिए….और एक दिन लाने ही पड़ेंगे!

rekhafbd के द्वारा
23/06/2012

समीर जी ,आपने बहुत अच्छा लिखा ,लेकिन यह जरूरी नही है पढ़ लिख कर ,नौकरी कर के भी उसे घरेलू हिंसा का शिकार नही होना पड़े गा ,पुरुष प्रधान समाज में किसी भी नारी को अपने घर में पति से बराबरी का अधिकार नही मिल सकता ,अब समय बदल रहा है ,समाज की सोच में भी बदलाव आ रहे है ,अच्छे आलेख पर बधाई

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    23/06/2012

    रेखा जी मै यह नहीं कह रहा की पढ़-लिख कर नौकरी कर लेने से स्त्री को घरेलु हिंसा से मुक्ति मिल जाएगी, किन्तु जब स्त्री आर्थिक रूप से किसी और पर निर्भर नहीं रहेगी, तब कोई उसे अपनी बपौती नहीं बना सकेगा और स्त्री तब प्रत्येक परिस्थिति का अपने दम पर सामना कर सकने के काबिल होगी और हिंसा करने वाले को इस बात का एहसास करा सकेगी की यदि उसने ऐसा करना बंद नहीं किया तो वह इतनी लाचार नहीं है की उसकी गालिया सुने और मार खाए, बल्कि वह स्वयं अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर सकती है….तात्पर्य यह की स्त्री की मजबूत सामाजिक और आर्थिक स्थिति होगी तो इस तरह की घटनाओं में बहुत हद तक कमी हो जायेगी क्योंकि प्रत्येक पुरुष को एक स्त्री जीवन साथी की आवश्यकता होती है और वह नहीं चाहेगा की उसकी वह पत्नी जो उसका सदा ख्याल रखती है उसके आचरण की वजह से उसे छोड़ कर चली जाए….क्योंकि अब वह स्त्री मजबूर नहीं है और आर्थिक रूप से सशक्त है!

vishleshak के द्वारा
21/06/2012

बहुत ही अच्छा और एक मात्र रास्ता ।धन्यवाद ।विश्लेषक@याहू.इन ।

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/06/2012

    विश्लेषक जी समर्थन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आप तो विश्लेषक हैं यदि आप सहमत हैं तो ये बहुत बड़ी बात है

vikramjitsingh के द्वारा
21/06/2012

समीर जी….सादर.. उत्तम प्रस्तुति……और आपके विचारों से पूर्णतया सहमती भी…..

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/06/2012

    विक्रम जी सादर, बहुत बहुत धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
21/06/2012

अनिल जी नमस्कार, विषय वस्तु का बहुत  ही सुन्दर और सटीक  विश्लेषण…… आपकी बातों से पूर्णतः सहमत…….बेहतरीन आलेख  की प्रस्तुति के लिये बधाई……

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/06/2012

    दिनेश जी नमस्कार, बस आपके द्वारा लिखे गए लेखों को की सुन्दरता और सटीकता से ही सीख रहा हूँ… बहुत बहुत शुक्रिया

20/06/2012

कमाल है जनाब! ….और क्या कमाल है यह तो मैं आपको बताने वाला नहीं… पर कमाल है और आश्चर्य भी …………………!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/06/2012

    सही कह रहे हैं अनिल जी कमाल तो है ही और दुनिया में बहुत से कमाल हैं…..उनमे से हम और आप कुछ से परिचित हैं और बहुत सारे कमालों से अपरिचित…..


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