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मैं पिता था तुम्हारा....

Posted On: 7 Jul, 2012 में

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नीचे प्रस्तुत की गयी कविता को मैंने एक सत्य घटना से प्रेरित होकर लिखा है, लेकिन अफ़सोस ये है की ये कहानी सिर्फ किसी एक घर की नहीं है अब तो ऐसा घर घर में होने लगा है…..आधुनिकता और व्यावहारिकता की बहुत घटिया सोंच का नमूना इस कविता के द्वारा-

जीते जी कोई फर्ज निभाया न गया तुमसे
मेरे मरने पे आज तुम अपने फ़र्ज़ निभाते हो,
एक गिलास पानी तो कभी पिलाया नहीं जीते जी
मेरे मरने के बाद मुझको साबुन से नहलाते हो,
जिंदा था तो कभी एक रोटी नहीं खिलाई
मर गया तो मुझको अब मिठाई खिलाते हो,
मेरे खाने-पीने का बोझ उठाया न गया तुमसे
आज मुझे अपने काँधे पे उठाते हो,
मेरे बिस्तर की चादर भी कभी सही न कर सके तुम
आज मेरे लिए लकड़ियों की शैय्या सजाते हो,
जीते जी मेरे मन को तो खूब जलाया था
आज मेरे निर्जीव तन को जलाते हो,
हैरान हूँ तुम्हारी आँखों में देख आंसू
दुनिया के डर से घड़ियाली आसू बहाते हो,
गालियाँ देने में मुझे शर्म आती नहीं थी तुमको
आज मेरे मरने का शोक जताते हो,
क्या था कुसूर मेरा मैं था पिता तुम्हारा,
चाहा था मैंने तुमसे बस थोड़ा सा सहारा,
क्या फ़र्ज़ ये तुम्हारा अधिकार न था मेरा,
मैंने ही तुमको पाला, तुमने ही मुंह को फेरा,
तुमसे अलग तो कोई संसार न था मेरा,
फिर किसके पास जाता, उम्मीद किससे करता,
तुम साथ गर जो देते तो इस तरह न मरता,
तुम्हारी बातों का ज़हर पीकर मैं कबका मर चुका था
ये शरीर ख़त्म करने को, था आज ज़हर खाया,
मेरी खुदकशी को तुमने दुनिया से है छिपाया,
मुझे सांप ने है काटा दुनिया को ये बताया,
हाँ सांप ने ही काटा पर सांप वो तुम्ही हो,
मेरी खुदकशी की असली, वजह तो तुम्ही हो,
जल्दी से जल्दी तुमको, मेरी दौलत चाहिए थी,
मेरी जिम्मेदारियों से बस फुर्सत चाहिए थी,
मैं आज मरता या कल, मिलता तुम्ही को सबकुछ,
दो रोटी, बोल मीठे, माँगा था और कबकुछ,
रोटी तो देते थे तुम, बातों के ज़हर के साथ,
ये ज़हर बढ़ रहा था, मेरी उमर के साथ,
इस उमर में आखिर कितना ज़हर पी सकता था मैं,
ऐसे हालात में भला कब तक जी सकता था मैं,
वाह मेरे लाडले, मेरे प्यार का, क्या खूब सिला दिया,
बुढापे में खुदकशी करने को,मजबूर कर दिया,
लेकिन कहीं शायद कुछ मेरी भी गलतियाँ थी,
जो संस्कार तुमको अच्छे न दिए मैंने,
थे कर्म मिलते-जुलते ऐसे ही किये मैंने,
अपने पिता से अच्छा व्यवहार कर न पाया,
आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया-
आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया!

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

MAHIMA SHREE के द्वारा
04/08/2012

नमस्कार समीर जी .. बहुत ही मार्मिक और यथार्थपरक रचना ….. हर युग मैं माता -पिता की उसके बच्चो द्वारा उपेछा की जाती रही है ……. उनके निर्बल होते ही … बच्चे अपने मन की करने लगते है …. कंही पिता द्वारा दिया गया संस्कार गलत होता है और कंही तो ये भी देखा गया है सही संस्कार देने के बाबजूद जब बेटे अपने पे आते है तो स्वार्थ के लिए अपने पिता की उपेक्षा करते हैं .. शुभकामनायें आपको

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    04/08/2012

    महिमा जी सदर अभिवादन एवं शुक्रिया

rajuahuja के द्वारा
11/07/2012

पंडित समीर खान साहब , इस उम्र में आखिर कितना ज़हर पी सकता था मैं , ऐसे हालात में भला कब तक ……………? मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ , साधुवाद ! दर-असल दुःख तब आता है जब हम किसी से अपेक्षा रखते हैं !औलाद का पालन-पोषण यदि हम अपना कर्म (अपेक्षा-रहित)समझ कर करें तो दुःख का कोई कारण ही नहीं बनता ! किसी फकीर के शब्द हैं ………. माली दा कम पाणी-पौना ते वो भर-भर मश्का पाए ! उस मालिक दा कम फल-फुल लौना ते वो लाये या ना लाये !!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    11/07/2012

    आपकी बातों में बहुत हद तक सत्यता है, किन्तु मनुष्य एक भावुक प्राणी होता है और उसकी भावनाएं अपने पराये जैसे शब्दों के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं….अपनों के साथ अलग व्यवहार दूसरों के साथ अलग…उसी तरह अपनों से अपेक्षाएं और दूसरों से नहीं…..पर आज के युग में बहुत ज़रूरी है की माता-पिता अपने बच्चो को रूपये पैसे को ज्यादा महत्व देना न सिखाये तथा बच्चो के लिए कुछ भी अच्छा करने के साथ-साथ अपने लिए कम से कम खाने-पीने भर को अलग से पैसे जमा करके रक्खे…..

allrounder के द्वारा
10/07/2012

नमस्कार भाई अनिल कुमार जी, बेहद भावुक रचना है आपकी, सचमुच इसे पढ़कर एक टीस सी उठती है, की आखिर मनुष्य अपने पैदा करने वाले के साथ ही ऐसा कैसे कर सकता है ! मगर समाज मैं ऐसा होता है और जब होता है……

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    11/07/2012

    हाँ मित्र जब सोंचो तो बहुत अजीब लगता है….लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ धीरे धीरे करके पैदा की जाती हैं या पैदा होने दी जाती हैं, जिससे बाप-बेटे, माँ-बेटे या भाई-भाई, भाई-बहन के रिश्तों से कहीं ज्यादा अहमियत रूपये-पैसे की लगने लगती है और बाकी सब रिश्ते बेमानी लगने लगते हैं…..घर के प्रत्येक सदस्य और मुख्या रूप से बड़े लोगों को रूपये पैसे को इतना महत्व नहीं देना चाहिए की उनके स्वयं के बच्चे भी रूपये पैसे को ही सब कुछ समझने लगे….

nishamittal के द्वारा
10/07/2012

आज की वास्तविकता को आपने सुन्दर शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया है,सच में संस्कार वही हैं,जो अपने व्यवहारिक जीवन से सिखाये जा सकते हैं, किन कहीं शायद कुछ मेरी भी गलतियाँ थी, जो संस्कार तुमको अच्छे न दिए मैंने, थे कर्म मिलते-जुलते ऐसे ही किये मैंने, अपने पिता से अच्छा व्यवहार कर न पाया, आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया- आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    11/07/2012

    जी निशा जी, संस्कार वाही हैं जो कर्मो के द्वारा सिखाये जाते हैं…. अगर आप मुंह से कुछ और कहेंगे और आपके कर्म कुछ और ही होंगे तो कोई भी हो आपके द्वारा कही हुयी बातों को ग्रहण नहीं कर सकेगा

yogi sarswat के द्वारा
10/07/2012

क्या था कुसूर मेरा मैं था पिता तुम्हारा, चाहा था मैंने तुमसे बस थोड़ा सा सहारा, क्या फ़र्ज़ ये तुम्हारा अधिकार न था मेरा, मैंने ही तुमको पाला, तुमने ही मुंह को फेरा, तुमसे अलग तो कोई संसार न था मेरा, फिर किसके पास जाता, उम्मीद किससे करता, तुम साथ गर जो देते तो इस तरह न मरता, तुम्हारी बातों का ज़हर पीकर मैं कबका मर चुका था ये शरीर ख़त्म करने को, था आज ज़हर खाया, मेरी खुदकशी को तुमने दुनिया से है छिपाया, अनिल जी , कितनी बेहतर तरीके और शब्दों में आपने पिता की व्यथा , उसके दर्द को व्यक्त किया है , वाह ! आपके अल्फाजों और आपके अभिव्यक्ति और प्रस्तुतीकरण की दाद देता हूँ !

Mohinder Kumar के द्वारा
09/07/2012

अनिल जी, पारिवारिक संबंधों की ढीली होती चूंलें, मनुष्य का स्वार्थी पन इस के लिये दोषी है. सामाजिक मुल्यों का ह्वांस होता जा रहा है. पश्चिमी सभ्यता हमारी मान्यताओं को चूनौती दे रही है.. और नई पीढी यह भूल जाती है कि कल को उन्हे भी उसी रास्ते से गुजरना है जिस से वो आप अपने बुजुर्गों को धकेल रहे हैं. सारपूर्ण रचना के लिये बधाई.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    10/07/2012

    मोहिंदर जी, आपकी बात पूर्ण रूप से सत्य है बहुत बहुत शुक्रिया

sadhna srivastava के द्वारा
09/07/2012

समीर जी ये तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बात है…. !! अगर हम अपने बच्चो से अच्छा व्यवहार चाहते हैं तो हमे पहले उन्हें अच्छा करके दिखाना ही पड़ेगा…. आखिर हमसे ही तो सीखते हैं वो…..!! एक बात और मुझे समझ नहीं आती…. कुछ माँ बाप अपने बच्चो को दूसरों के साथ चालाकी करना सिखाते हैं लेकिन वो ये क्यों भूल जाते हैं कि कल यही सीख उनपर भी लागू हो सकती है…. !!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    10/07/2012

    साधना जी ऐसा ही कुछ इस घटना पर भी लागू होता है….बच्चों को इतना ज्यादा स्वार्थी और चालाक बनाया गया की बाद में वाही चालाकी उन्होंने अपने घर के अन्दर भी दिखानी शुरू कर दी है

Chandan rai के द्वारा
09/07/2012

अनिल मित्र , आपने किसी और की पीड़ा की भी पूरी संवेदना से उतार दिया ! सत्यार्थो से लबरेज आपकी कविता एक सुन्दर सन्देश भी देती है ! जो संस्कार तुमको अच्छे न दिए मैंने, थे कर्म मिलते-जुलते ऐसे ही किये मैंने, अपने पिता से अच्छा व्यवहार कर न पाया, आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया- आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया! सुन्दर रचना !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    10/07/2012

    चन्दन भाई, यह पीड़ा मुझे इसलिए भी है क्योंकि मैं एक संवेदनशील इंसान हूँ साथ ही इसलिए भी है की मेरे ही करीबी थे वह जिनके साथ यह घटना घटित हुयी… किन्तु वह कारण गले से उतरते नहीं जिनकी वजह से उनके अपने बेटों ने उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया

shashibhushan1959 के द्वारा
08/07/2012

आदरणीय अनिल जी, सादर ! इस रचना की प्रशंसा करने में स्वयं को अक्षम पाता हूँ ! अद्भुत भाव, एवं प्रवाह से भरी रचना ! दिल को छूती हुई, यथार्थ के अत्यधिक समीप ! “”"लेकिन कहीं शायद कुछ मेरी भी गलतियाँ थी, जो संस्कार तुमको अच्छे न दिए मैंने, थे कर्म मिलते-जुलते ऐसे ही किये मैंने, अपने पिता से अच्छा व्यवहार कर न पाया, आज आखिर उसका ही मूल्य है चुकाया-”"” प्रायः घर-घर की कहानी ! आज के सामाजिक बिखराव का ज्वलंत वर्णन ! द्रवित करने वाली रचना ! मेरी हार्दिक बधाई !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/07/2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, इतनी विस्तृत प्रतिक्रिया की लिए बहुत बहुत शुक्रिया, कुछ दिनों पहले ऐसी घटना घटित हुयी और इससे मुझे अत्यंत दुःख हुआ उसी दुःख और विचारों का प्रकटीकरण करने में मैं अगर कुछ हद तक सफल हो पाया हूँ तो शायद कुछ लोगों की विचारधाराओ में सकारात्मक परिवर्तन हो सकेगा और कुछ माता-पिताओं की जिंदगी नरक बनने से बच सकेगी…

yamunapathak के द्वारा
08/07/2012

आपकी यह कविता आज के आधुनिक समाज का यथार्थ चेहरा है.काश! सभी बच्चे अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभा पाते. शुक्रिया

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/07/2012

    yamuna ji, bachche अक्सर वैसा ही व्यवहार karte hain jaisa ve अपने से बड़ों से सीखते hain… aaj ham अपने kartavya sahi से nibhaayenge to zyaadaatar bachche bhi वैसा hi karenge….haan kuch bachche zaroor anya kaarano से bigad sakte hain…..

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
08/07/2012

yatharth chitran

08/07/2012

अनिल जी…………………क्या खूब लिखा है आपने……………… समाज के सच को उजागर करती रचना…………… “जो संस्कार तुमको अच्छे न दिए मैंने, थे कर्म मिलते-जुलते ऐसे ही किये मैंने,”

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/07/2012

    प्रत्येक मनुष्य जैसा आचरण करता है….ज़्यादातर मामलों में उसके अपने बच्चे वैसा ही व्यवहार करते हैं, आज मैं अपने पिता से अच्छा व्यवहार नहीं करूँगा तो मेरे बच्चे भी वही सीखेंगे…हमें स्वयं स्वार्थ की भावना को त्यागना होगा तभी हमारे अपने बच्चे भी स्वार्थी होने से बच सकते हैं, नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा

dineshaastik के द्वारा
08/07/2012

अनिल जी यह कविता एक सच्ची घटना ही लग रही है, लगता है जैसे मेरे ही पड़ोस की हो, कितना स्वार्थी हो गया है आदमी, धन से तो जुड़ गया है पर आदमी से  दूर हो गया है।

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/07/2012

    समाज के प्रत्येक व्यक्ति में स्वार्थ की बढती हुयी भावना ने सारे रिश्तों-नातों और इंसानियत को निगलना शुरू कर दिया है…..देखे आगे-आगे क्या होता है?


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