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आरक्षण की आवश्यकता बनाम आरक्षण की राजनीति

Posted On: 11 Sep, 2012 में

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अन्याय है, सरासर अन्याय है कि एक ही समय में देश के विभिन्न प्रान्तों के विभिन्न परिवारों में पैदा हुए होनहार सपूतों के साथ अलग-अलग प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है! दलित परिवार में पैदा होने वाले बच्चे मुफ्त सिक्षा पा रहे हैं जबकि सवर्ण परिवार में पैदा होने वाले बच्चों से शुल्क लिया जाता है, दलित परिवार में पैदा होने वाले बच्चों को कॉलेज में दाखिले में आरक्षण दिया जाता है, अन्य पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण दिया जाता है जबकि सवर्ण परिवार में पैदा होने वाले बच्चों को ज्यादा योग्य होने पर भी अच्छे कॉलेजों में दाखिला मिलना मुश्किल हो जाता है! इतना ही नहीं इसके अलावा दलित और पिछड़ा वर्ग के लोगों को नौकरियों में भी आरक्षण दिया जाता है जबकि उनसे योग्य सवर्ण युवाओं को अक्सर नौकरी नहीं मिल पाती! अरे, इतने पर भी चैन कहाँ है अभी तो प्रोन्नति में भी आरक्षण चाहिए!

आखिर क्यों?

क्या इस क्यों का कोई जवाब है किसी के पास?

हो सकता है कि इस क्यों का जवाब हो, लेकिन अगला सवाल ये है कि उस जवाब को सुनने और सुनकर समझने के लिए समाज के किस-किस वर्ग के कितने लोग तैयार है? शायद अंजाम ये होगा कि जिस समुदाय को आरक्षण मिलता है, वह आरक्षण के पक्ष में रहेगा और जिसे नहीं मिलता , वह आरक्षण के विरोध में रहेगा! तो फिर आखिर इन लम्बे चौड़े लेखों को लिखने और दुनिया भर की बहस करने का क्या फायदा?…….फायेदे की चिंता मत करो भईया ! बस अपना कर्म समझते हुए इसे कर डालो…..वैसे भी हमारे और आपके चाहने से होगा क्या? होगा तो वही जो मंत्री जी चाहेंगे!

अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी…….क्योंकि इस आरक्षण का कारण बहुत पुराना है, इसका वृक्ष ज़रूर आज़ादी के आस-पास प्रकट हुआ, लेकिन इसका बीज बहुत पहले बो दिया गया था और यह बीज जिस भूमि पर बोया गया था, वह भूमि हज़ारों साल पहले से तैयार कि जा रही थी! इस भूमि में दलितों के साथ हज़ारों वर्ष तक होने वाले अत्याचारों की अनगिनत कहानियाँ दफ़न है, जिनका अब विस्तार पूर्वक वर्णन करने का कोई औचित्य नहीं…सिर्फ आपको याद दिलाने के लिए वर्णन कर दिया!

सवर्ण वर्ग का दुःख यह है कि उसके अनुसार बाकी सबसे अधिक योग्य होने के बावजूद उसे उसकी योग्यातानुसार शिक्षा और नौकरी नहीं मिल पाती, क्योंकि दलितों और पिछड़ों को इन क्षेत्रों में आरक्षण प्राप्त है! जिसके दम पर वे कम योग्य होने के बावजूद सवर्णों से आगे निकल जाते है ! बिलकुल सत्य बात है यह….चाहे शिक्षा हो या नौकरी का मामला, बहुत से सवर्ण अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों से अधिक योग्य होने के बावजूद भी मनचाहे क्षेत्र में शिक्षा और नौकरी नहीं प्राप्त कर पाते, कारण ये कि अन्य वर्गों को आरक्षण प्राप्त है!…..अच्छा कभी किसी ने ये सोंचा कि आखिर यह सवर्ण वर्ग जिसकी वैसे तो समाज में संख्या 50 प्रतिशत से कम है किन्तु फिर भी उसके लिए आरक्षित 50 प्रतिशत सीटों के भर जाने के उपरान्त भी अन्य वर्गों से अधिक योग्य सवर्ण शिक्षा या नौकरी से वंचित रहते हैं! ऐसा क्यों? सवर्ण वर्ग इतना योग्य कैसे हो गया? क्या वह जन्मजात ही हमेशा से अन्य वर्गों से श्रेष्ठ रहा है…..या सभ्यता एवं समाज में ऐसी व्यवस्था विद्यमान रही है, जिससे सवर्णों को अन्य वर्गों से अधिक विकसित होने का मौका मिला! सभी जानते है अपने भारतीय समाज में प्राचीन काल से शिक्षा प्राप्त करना सिर्फ उच्च वर्ग का अधिकार था! एक विशिस्ट वर्ग को तो शिक्षा ग्रहण करने तथा वेदादि का अध्ययन करने पर उसकी कीमत अपनी जीभ कटवाकर या कानो में पिघला हुआ शीशा डलवाकर चुकानी पड़ती थी! यह विशिष्ट वर्ग सिर्फ गुलामो और जानवरों की तरह जीवन जी सकता था, जिसके कोई अधिकार नहीं थे, सिर्फ कर्तव्य थे, जिसने शायद उस समय कभी भी इंसान होने का एहसास ही नहीं किया होगा! दूसरी तरफ सवर्ण थे जिन्हें शिक्षा ग्रहण करने, शाशन करने, व्यापार करने, शिक्षा देने, धन एकत्रित करने के इत्यादि समस्त प्रकार के अधिकार थे! जिससे सवर्ण वर्ग का अत्यधिक विकास हुआ और आज उसका ही फल है कि सवर्णों में ज़्यादातर की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक और बौद्धिक स्थिति बाकी वर्ग के लोगों से अधिक अच्छी है! इसके अलावा भले ही कोई सवर्ण कैसी भी परिस्थिति में हो, गरीबी में हो वह अन्य वर्गों से अधिक पढ़ाई करता है, उसे शिक्षा का महत्व पता है, इसी के दम पर वह अन्य वर्ग के लोगों से अधिक योग्य हो जाता है!

आरक्षण का विरोध करने वालों का अक्सर ये कहना होता है कि आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए क्योंकि यदि कोई योग्य है तो उसे आगे आने के लिए आरक्षण की ज़रुरत नहीं है तथा ऐसे व्यक्ति को आगे आने से कोई भी परिस्थिति नहीं रोक सकती! वह अपनी मेहनत, लगन, बुद्धि और योग्यता के दम पर एक दिन ज़रूर सफल हो जाएगा!…….सही बात है बिलकुल सही बात है, जो योग्य है उसे आगे आने से कोई नहीं रोक सकता, वह एक दिन ज़रूर सफल होगा! तब फिर यह बताइये कि सवर्ण वर्ग ही सदा से योग्य रहा है, आज भी वही सबसे योग्य है, फिर उसे डर किस बात का है? वह तो एक न एक दिन अपनी योग्यता के दम पर आगे आ ही जाएगा ! ऐसे में जो लोग योग्य नहीं है, समाज की मुख्य धारा में शामिल नहीं हैं, अयोग्य हैं, अशिक्षित है, उन्हें आरक्षण का लाभ लेकर आगे आने दीजिये ताकि एक दिन उनकी भी अधिकतर संख्या आपकी तरह योग्य हो जाए!
अब बात यह उठती है कि क्या वाकई इस आरक्षण का फायदा उस विशिष्ट वर्ग को मिल रहा है, जिसके लिए इसे संविधान द्वारा लागू किया गया था? नहीं….उस स्तर का सुधार नहीं हुआ है जिस स्तर का सुधार होना चाहिए था क्योंकि इसे लागू करने वाली सात्ताधारी दल ने कभी भी इसे पूरी निष्ठां एवं ईमानदारी से लागू करना ही नहीं चाहा, बस इसे एक लौलीपौप बना दिया गया तथा इसे हर बार चुनाव आने से पहले उस वर्ग को के सामने इसे चांटने के लिए रख दिया जाता है जिससे कि यह सम्बंधित है! गौरतलब है की आरक्षण की व्यवस्था को संविधान में डॉ० आंबेडकर द्वारा शुरुवाती 10 -15 वर्षों के लिए ही रखा गया था, क्योंकि उनके अनुसार यदि इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू किया जाता तो शुरू के 10 -15 वर्षों में ही असमानता समाप्त हो जाती! किन्तु वह कौंग्रेस जो आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों को दिए जाने वाले विशिस्ट चुनाव के अधिकारों के विरोध में थी तथा जिसके विरोध में गांधी ने आमरण अनशन किया! जिससे डॉ० आंबेडकर तथा दलित समाज ने अपने विशिष्ट चुनाव के अधिकारों का त्याग कर दिया! वही कौंग्रेस बाद में आरक्षण को हनुमान की पूंछ की तरह लंबा करते रहने में ही अपनी भलाई देखने लगी! इससे अधिक इस स्वार्थी दल की क्या पोल खोली जाए! इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में इतनी खामियां रही की कभी भी इसका पूरा फायदा उस वर्ग को नहीं मिला जिसके लिए इसकी व्यवस्था की गयी थी! इसी का परिणाम है कि आज़ादी के बाद 65 वर्ष गुजर गए लेकिन आरक्षण की वह व्यवस्था जिसे मात्र 10 -15 वर्षों में समाप्त हो जाना चाहिए था, आज भी बनी हुयी है ! लेकिन यह तो स्पष्ट है कि इसका कुछ फायदा ज़रूर उस वर्ग को मिला है जिसके लिए यह थी! तभी आज बाकी वर्ग की ज़्यादातर जनसँख्या यह कहने लगी है कि अब भेदभाव नहीं रह गया है सभी बराबर हो गए हैं तथा जो आरक्षण है उसका सही फायदा अब उस वर्ग तक नहीं पहुँच रहा है जिसके लिए यह है, इसलिए अब आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए!……सही बात है आरक्षण का ज़्यादातर फायदा उस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है जिसे यह मिलना चाहिए था! किन्तु फिर भी इस आरक्षण के चलते बहुत से पिछड़े वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है! हाँ इस व्यवस्था का कुछ दुरूपयोग भी हुआ है! लेकिन भईया ये कौन सी अनोखी बात है? भारत में तो प्रत्येक क्षेत्र ऐसा ही है जहाँ जो व्यवस्था जिसके लिए की जाती है, उस तक उस वयस्था का मात्र 5 -10 प्रतिशत ही पहुँचता है बाकी सब घपलों और घोटालों या कमीशनखोरी में चला जाता है! अब क्या आप कहेंगे की समस्त योजनायें बंद कर दो क्योंकि उसका सही हक उसके सही हक़दार तक नहीं पहुँच रहा! तब तो समस्त योजनाये रुक जायेंगी! इसलिए आवाज़ तो ज़रूर उठाइये लेकिन जो लोग गलत कर रहे हैं उनके खिलाफ, न की किसी ऐसी विशिष्ट योजना के खिलाफ जिससे कुछ हक़दार लोगों का भला हो रहा, लेकिन उसमे अन्य व्यक्तियों की वजह से खामिया आ गयी हैं, उसमे भी बड़ी लापरवाही शासन की तरफ से ही की जा रही है! आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जिसमे सरकारी कुप्रबंध की वजह से अव्यवस्था और घोटाले देखने को न मिलते हों…ज़रुरत तो है ज़िम्मेदार लोगों के सामने आने की और शासन की बागडोर ज़िम्मेदार लोगों को सौंपने की! लेकिन यक्ष प्रश्न वो मिलेगा कहाँ? मिलेगा कैसे भईया जब हम सभी बचपन से लेकर बड़े होने तक अपने परिवार से लेकर समाज तक में अपने स्वार्थ को साधने की ही शिक्षा ग्रहण करते हैं ऐसे में हम देश का भला कैसे सोंचेगे?
अब प्रश्न यह है की आखिर पदोन्नति में आरक्षण की आवश्यकता क्या है?
तो इस प्रश्न का जवाब यह है की संविधान के अनुच्छेद 16 (4) क के अनुसार यदि केंद्र सरकार द्वारा सर्वेक्षण करवाए जाने पर इस बात की पुष्टि होती है की उच्च पदों पर अनुसूचित जाती, जनजाति का प्रतिनिधित्व औसत से कम है तो केंद्र सरकार सम्बंधित राज्य और उसके सम्बंधित विभाग में इस वर्ग के लिए पदोन्नति में आरक्षण का कानून पारित कर सकती है! अब नज़र डालते हैं आंकड़ों पर -
*भारत सरकार में 149 सचिव हैं जिनमें एक भी अनुसूचित जाति का नहीं। 108 अतिरिक्त सचिव में केवल दो अनुसूचित जाति के हैं। 477 कनिष्ठ सचिव हैं, जिसमें केवल 31 अनुसूचित जाति के हैं। इस तरह से 590 निदेशकों में से 17 इस वर्ग से हैं।
*शिक्षा जगत में स्थिति और भी खराब है। कुल 1864 प्रोफेसरों में से 14 अनुसूचित जाति और 11 जनजाति के हैं। इस तरह से रीडर के पद पर 38 अनुसूचित जाति के और 23 जनजाति के हैं, जबकि कुल संख्या है 3533। प्रवक्ता के पद पर भी स्थिति आरक्षण के अनुपात में दयनीय है। कुल 6688 प्रवक्ताओं में से 372 अनुसूचित जाति के और 223 जनजाति के हैं।
*इसके अलावा लगभग प्रत्येक विभाग में औसतन आधे से ज्यादा अनुसूचित जाति-जनजाति के पद रिक्त है तथा पिछड़ा वर्ग की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है !
अगला प्रश्न यह की क्या इस आरक्षण की वजह से भारत से योग्यता और श्रेष्ठता धीरे-धीरे समाप्त होती चली जा रही है? इस बात का तो समर्थन बिलकुल भी नहीं किया जा सकता क्योंकि बहुत बड़े-बड़े महान लोगों का कहना है की सोना आग में तप कर ही और निखरता है…..यानि हर वह योग्य व्यक्ति जो निरंतर संघर्षरत है वह एक दिन ज़रूर अपना और अपने देश का नाम रौशन करेगा! इसके अलावा वह समुदाय जो अभी सोना नहीं है, उसे ज़रुरत है ऐसी व्यवस्था की, ऐसे सहारे की जिसके माध्यम से वह पहले योग्य लोगों की श्रेणी में आ सके!….सोना नहीं तो कम से चांदी से ही अपनी तुलना कर सके, उसके बाद वह भी संघर्ष करके अपनी क्षमता, अपनी योग्यता दिखाएगा ! एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा! बस ज़रुरत है की समाज की वह दोमुही मानसिकता ख़त्म हो जाए जो एक तरफ तो प्रत्येक मनुष्य के बराबर होने की दुहाई देती है, दूसरी तरफ कुछ विशिष्ट वर्ग के लोगों को सिर्फ जन्म के आधार पर नीचा समझती है, उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का, अच्छी नौकरी करने का, उच्च पदों पर आसीन होने का अधिकारी नहीं समझती ! इसी विचारधारा के चलते आज भी बहुसंख्यक विभागों में इस विशिष्ट वर्ग के लोग उच्च पदों तक नहीं पहुँच पाते! यह सिर्फ कोरी बात नहीं एक सूचना के अधिकार में प्राप्त की गयी जानकारी है! अब ऐसी वर्ग को बराबरी का मौका मिलना ही चाहिए! समाज में बराबरी होनी ही चाहिए, समानता का व्यवहार होना ही चाहिए, लेकिन समानता का व्यवहार किये जाने से पहले सभी को समान सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर लाना बहुत आवश्यक है! असमान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना असमानता है तथा समान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाना भी असमानता है! अब या तो सब लोग जाति-पाति का आडम्बर त्याग कर समान हो जाएँ या असमान वर्ग को आरक्षण के माध्यम से आपके बराबर योग्य हो जाने का मौका दें! अब आप एक ही साथ चित और पट नहीं ले सकते ! या तो आप श्रेष्ठ हैं या तो आप समान हैं ! अब आप ही तय करें की आप क्या हैं?

(प्रतिक्रिया देने वालों से आग्रह है कृपया अधूरी प्रतिक्रिया न दें, सबसे लाजिमी प्रश्न है की क्या तथाकथित श्रेष्ठ वर्ग जाति-पाति को त्याग कर समान होना चाहता है? जिसका जवाब ऐसे वर्ग के लोगों को देना चाहिए तथा ऐसा वर्ग जिसे आरक्षण मिलता है, उसे जवाब देना चाहिए की क्या वह ऐसा होने पर आरक्षण का त्याग करने को तैयार है?)

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kpsinghorai के द्वारा
21/09/2012

अनिल जी, आरक्षण को लेकर दो तरह के वर्ग हो सकते हैं एक तो वे जिन्हें नहीं मिल रहा है और दूसरे वे जिन्हें मिल रहा है। राजनीति की पाटी में यह खेल चलता रहेगा परंतु इसे नकारा नहीं जा सकता कि समाज के उस वर्ग को उत्थान के लिए सम्बल देना जरूरी है जो सदियों से उपेक्षा झेलता आ रहा है। आखिर समान अवसर की अवधारणा पहले ही क्यों नहीं अमल में लाई गई। हालांकि, इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आरक्षण को जिस ढंग से लागू किया गया उससे वह असली वर्ग उपेक्षित ही है और शायद बना ही रहे जिसके लिए इसकी व्यवस्था दी गई। यही वजह है कि इस वर्ग में चुनिंदा लोगों को छोड़कर बाकी इससे महरूम ही हैं। ऐसे में जरूरी है कि न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर इसका विरोध करने वाले उन्हें इस तरह से आरक्षण दें कि वे बेहतर मुकाम हासिल करने में कठिनाई न महसूस करें और राजनीतिज्ञों की बजाय समाज के लोग ही इसे बेहतर ढंग से अमल में ला सकते हैं। अगर झगड़ा मिटाना है तब इसे सामाजिक परिपाटी पर कसना होगा वरना कानूनी दांव-पेंचों और राजनीति के बीच यह केवल मुद्दा भर बना रहेगा।

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/09/2012

    आपका विश्लेषण एकदम सही है के० पी० जी

ekaadivasi के द्वारा
18/09/2012

अनिलजी, आपने मेरी बात नहीं समझी. मेरे अनुसार मैंने एक बेहतरीन उदाहरण देकर आपको (बल्कि सभी जनरल कैटेगोरी के भाइयों से) समझाने की कोशिश की कि आरक्षण किस तरह से हमारे बीच है. आपके जवाब को पढ़कर लगा कि आप (या आपकी तरह सोचने वाले भाई) वस्तुत: आरक्षण के विरुद्ध नहीं हैं. सरकार की गलत पॉलिसी के विरूद्ध हैं. सरकार ने आरक्षण की पॉलिसी को ठीक ढंग से नहीं चलाया वर्ना आजादी के दस – पन्द्रह सालों तक हम सब शायद एक बराबर हों जाते. तो लड़ाई “आरक्षण हटाओ” की न हों करके “आरक्षण को सही ढंग से लागू करो” की लड़ाई होनी चाहिए. क्योंकि कम से कम यहाँ झारखंड में तो जरूरतमंदों की संख्या बहुत अधिक है. सुदूर गांवों में शायद ही लोगों को पता होगा कि “आरक्षण” नाम की कोई चीज होती है, सरकार ने उन्हें आगे बढ़ाने के लिये कुछ पॉलिसियां रखी हैं. लोग यहाँ कटहल के बीज ही खा कर दिन गुजारते हैं. ये हालत राँची के पास के एक गाँव की है. इस गाँव में कटहल बड़ी संख्या में होते हैं. खेती नहीं हो पाती और लोग कटहल के मौसम में कटहल का गूदा खाते हैं और बीज को उबालकर और सुखाकर रख लेते हैं. जो काफी समय तक ठीक-ठाक खाने योग्य रहता है. क्या आप ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे? आप नहीं चाहेंगे कि वो लोग कटहल के बीज के बजाय चावल या रोटी खाएं? वो कैसे ठीक से पढ़ लिख पाएंगे और कोई नौकरी पाएंगे अगर आरक्षण न हों. कल के उदाहरण से मिलता जुलता उदाहरण देना चाहूँगा. हमलोग घरों में भाई भाई में जमीनों का बंटवारा क्यों करते हैं? क्यों नहीं सभी भाई एक साथ रह कर प्रेम-पूर्वक जिंदगी बिताते हैं? क्योंकि उनके पिता जानते हैं कि उनमें से ताकतवर भाई सारी जमीन अकेले ले सकता है और बाकी भाई मुसीबत में पड़ सकते हैं. इस उदाहरण को अन्यथा न लें. और ऐसा कतई नहीं है कि आरक्षित होते हुए और कम मेहनत करके हमलोगों को कोई नौकरी आसानी से मिल जाती है. हमें अपने एस. टी. भाइयों/बहनों से कंपटीशन करना होता है और सच्चाई यह है कि आप लोगों का कंपटीशन आपके ही बीच है.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/09/2012

    मित्र, हम सबकी यही कमी है की हम सामने वाले की बात को ठीक उस ढंग से नहीं समझ पाते जैसा की वह समझाना चाहता है, आपके विचारों को मेरा समर्थन है

harirawat के द्वारा
18/09/2012

अनिल कुमार “पंडित” समीर खान, पहले आप मुझे यह बताएं की ये लेख दो लेखकों के परिश्रम का फल है या ये हिन्दू-मुसलमान के गठ जोड़ एक ही नाम है, अगर ये एक ही नाम है तो मुझे यह लिखने में कोइ गुरेज नहीं है की आप स्वयं विभिन्नताओं में एकता का प्रतीक हैं “राम रहीम ” जैसे संत ! आपने आरक्षण पर एक सार गर्भित लेख लिखकर पाठकों के बीच बहश छेड़ दी है ! वैसे आपने लेख को सभी मुद्दों से जोड़कर कोई कोना खाली छोड़ा ही नहीं जिस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की जा सके ! आप स्वयं इस फिल्ड में एक जानी पहिचानी सक्षियत हैं और आपके लेख पर कोई प्रतिक्रिया देना ख़ास कर मेरे लिए आसान नहीं है फिर भी कोशीश कर रहा हूँ ! ‘सविधान में विद्वानों ने जनता द्वारा दुद्कारे हुए पिछड़े वर्ग को उनकी आर्थिक और सामाजिक स्तर को सुधारने के लिए ‘आरक्षण’ की व्यवस्था की थी ! सविधान सभा के चेयरमैन बाबा डा0 अम्बेडकर थे जो खुद भी समाज के पिछड़े वर्ग से सम्बंधित थे, वे स्वयं भी नहीं चाहते थे की समाज के इस वर्ग को आरक्षण की वैशाखी दी जाय बल्की वे चाहते थे की इस वर्ग को शिक्षा का उचित अवसर देकर उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जाय ! यह जरूरी नहीं है की अपर क्लास में पैदा होने वाले सारे बच्चे होनहार प्रतिभावान ही हों ! पिछड़े वर्ग में भी अगर उन्हें शिक्षा का उचित अवसर दिया जाय तो फिर उन्हें आरक्षण रूपी वैशाखी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी ! राजनेताओं को, राजनीतिक पार्टियों को आरक्षण रूपी भट्टी में अपनी चपाती सकने का अवसर मिल रहा है ! इसीलिये वे समाज को तोड़ते जा रहे हैं आरक्षण रूपी हथियार का सहारा लेकर ! अनिल जी आप स्वयं जाकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उड़ीसा के अति पिछड़े इलाकों में जाकर देखें ! आरक्षण केवल उन्हीं लोगों को मिल रहा है जो राजनीति में दखल दे रहे हैं तथा राजनीति की चौसर पर अपनी गोटी बिठा रहे हैं ! जो असली हकदार हैं इस आरक्षण के वे तो आज भी सिरों पर गन्दगी धोने को मजबूर हैं ! आपको शायद बिल्डरों की गगन चूमती स्काई लार्क बिल्डिंगों में काम करने वाले लाचार मजदूरों को तो देखा होगा आपने, जेठ की दुपहरी में अपने नन्ने ननिहालों को एक बोरी के टाट में लपेट कर सडकों के किनारे छोड़ कर माँ बाप अपने कामों लग जाते हैं ! यहाँ तक की ८ साल पूरे होते ही उनके बच्चे भी माँ बाप का हाथ बटाते पत्थर तोड़ने में लग जाते हैं ! पंजाब में फसल के टाईम पर बिहार के बहुत सारे गरीब वहां मजदूरी करते मिल जाएंगे ! वे आज से ६५ साल पहले भी ऐसे ही थे और आज भी उसी हाल में हैं, क्या आरक्षण इस वर्ग के लिए नहीं है, अगर इन मजदूरों के बच्चों को शिक्षा का अवसर मिल जाय तो वे भी प्रतिभाशाली बन सकते हैं ! फिर ये आरक्षण की सुविधा कौन ले रहा है ! ये असली बहस का मुद्दा होना चाहिए !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    18/09/2012

    हरी जी, मैंने पूरे भारत की वस्तुस्थिति नहीं देखी है, न ही यह बहुत आसान है, मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ, लखनऊ इसकी राजधानी है और मैं लखनऊ में ही रहता हूँ! यानी लखनऊ में जो भी स्थिति होगी वह बाकी उत्तर प्रदेश से अच्छी ही होगी…लखनऊ में भी कई गाँव है और कई में मेरे मित्र रिश्तेदार इत्यादि रहते हैं…इसलिए काफी कुछ चीजे स्वयं देखी हैं मैं, साथ ही अखबार पढ़कर भी बहुत ज्ञान हो जाता है, इसके अलावा विधि का छात्र हूँ, इसलिए नियम कानूनों की भी जानकारी है…. अब बात रही आरक्षण का फायदा किस वर्ग को मिल रहा है और किस वर्ग को नहीं? ये तो क्षेत्र विशेष पर बहुत कुछ निर्भर करता है की वहा कैसा माहौल है…लेकिन कानूनन प्रत्येक अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को यह मिला हुआ है और ज़्यादातर क्षेत्रों में इस बात का ज्ञान प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को है! अब अगर आपको मुफ्त शिक्षा का अधिकार है, विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था आपके लिए है, सरकारी विद्यालयों में मुफ्त कॉपी किताब भी मिलती हैं, फिर भी आप अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, चाहे किसी डर के कारण या इस कारण की ६-७ वर्ष की अवस्था में आप उसे अपने साथ काम पर ले जाओगे और वो पैसे कमाने लगेगा तो ये आपकी गलत सोंच का परिणाम होगा, की आप आज भी पिछड़े और गरीब बने हुए हैं! अगर आप अपने अधिकारों के लिए लड़ाई नहीं लड़ सकते तब तो यह और भी बुरा है और अन्याय है डॉ. अम्बेडकर द्वारा आजीवन लड़ी जाने वाली उस लड़ाई के साथ जो आप जैसे ही लोगों के लिए थी! आप गरीब हैं, आपको खाना मुफ्त में मिल रहा है…..अब आप कहे की कोई इसे हमारे मुंह में नहीं डालता तब तो वाकई यह खाना आपको कभी नसीब नहीं होगा!….. मेहनत आपको करनी पड़ेगी उसे उठाने की, कोई आपको ऐसा करने से रोकता है तो आपको लड़ना पड़ेगा…..आज फिर किसी अम्बेडकर के इंतज़ार में हैं तो आपका भला हो चुका जितना होना था……

ekaadivasi के द्वारा
17/09/2012

अनिल कुमार जी, आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा. बहुत दिनों से इस समय का इंतजार था जब मैं मन में उठ रही हलचल को किसी सही जगह पर व्यक्त कर सकूं. आपके लेख के माद्यम से यह अवसर मिला. मैं झारखंड का एक आदिवासी हूँ. १५ साल दिल्ली में नौकरी करने के बाद अब वापस झारखंड में हूँ. मुझे जहां तक लगता है आरक्षण जरूरी है. आप लोगों ने पिछड़े समुदाय के लोगों के घरों में नहीं देखा है जिनको इस आरक्षण की जरुरत पड़ी. बगैर आरक्षण के वो शायद आपके सामने या बगल क्या, कहीं नजर ही नहीं आते. आप आरक्षण को इस नजर से देखें – एक पिता के दो बेटे थे. मरते हुए पिता ने जमीन के दो हिस्से कर दिए. बड़े को 75 प्रतिशत और छोटे को 25. बड़े को छोटे की जमीन से कोई मतलब नहीं, छोटे को बड़े की जमीन से कोई मतलब नहीं. बड़े के दो बेटे हुए, छोटे के भी दो बेटे हुए. दोनों ने अपनी-अपनी जमीन के 50-50 प्रतिशत अपने बेटों में बांटे. बड़े भाई के बेटों को छोटे भाई की जमीनों से कोई मतलब नहीं. मेरा कहने का उद्देश्य यह है कि इन्हीं जमीनों की तरह आरक्षण भी है. हमलोग आपकी जमीनों को नहीं ले रहे, उसपर कोई दावा नहीं कर रहे. हम हमारे (आरक्षित) इलाके में ही हैं. आप भी सिर्फ अपनी जमीन को देखें.  और प्रोन्नति पर आरक्षण वाली बात भी जरूरी है. यह तो आप भी मानते हैं कि अनुसूचित जाति या जनजाति के लोग ऊँचे पदों तक अभी भी नहीं पहुँच पाए है. आपने शायद वो डाटा कहीं से उठाया हो. पर ये मेरे अपने चाचाजी, मेरे भैया और बहन की ननद की कहानी है कि उनको कितने सालों और कितनी प्रोन्नति मिली. उनके अफसर हर बार उनके काम में कुछ न कुछ नुक्स निकाल देते थे. बहन कि ननद को दस साल हो गए जॉब करते हुए. अब वो मेनेजर बन पाई है और उम्मीद कर रही है कि इस साल शायद बोनस मिले. ये सब कोई मनगढंत कहानियाँ नहीं हैं, हकीकत हैं. मैं इंतजार कर रहा हूँ उस दिन का जब हम लोगों को आरक्षण की जरुरत बिलकुल नहीं पड़ेगी. उस समय को आने में कुछ वक्त लगेगा.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    18/09/2012

    मित्र, जब हम पूरे समाज के सामने किसी ऐसे मुद्दे पर बात करते हैं जो बहुत बड़े वर्ग से जुड़ा हो तो जहां तक हो सके उसमे हमें व्यापक उदाहरण प्रस्तुत करने पड़ते हैं और विस्तृत आंकड़े देने पड़ते हैं! ऐसा नहीं है की भेदभाव का शिकार मैं नहीं हुआ या नहीं हो रहा, किन्तु मैं कुछ व्यक्तिगत घटनाओं से अधिक महत्व राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों को ही दूंगा….जिसे कोई झुठला नहीं सकता, मेरे व्यक्तिगत अनुभवों को तो लोग झूठ भी कह सकते हैं! अब बात रही आरक्षण की आवश्यकता की तो वह तो है ही, साथ ही आवश्यकता इस बात की भी है कि इसका क्रियान्वयन सही ढंग से हो, क्योंकि सही क्रियान्वयन के अभाव में एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे आज इसकी आवश्यकता है, वह इससे वंचित बना हुआ है! जितने सही ढंग से आज इसका क्रियान्वयन होगा, उतनी ही जल्दी कल इसकी आवश्यकता समाप्त हो जायेगी! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
15/09/2012

अनिल भाई, आपके विचार बेहद प्रखर हैं। कमलापति त्रिपाठी जब रेलमंत्री थे उस समय मोटी तनख्वाह होने के कारण सफाई कर्मचारी के पदों पर सवर्णों का कब्जा हो गया था। आज भी वे वाल्मीकि समाज के लोगों को अपनी जगह सफाई के लिए मामूली मेहनताने पर भेजकर खुद मौज काट रहे हैं। क्या सफाई कर्मचारियों के मामले में भी अनुसूचित जाति के लोगों में योग्य नहीं मिले थे, जिसकी वजह से यह तकलीफ सवर्णों को करनी पड़ी। शायद इसका जवाब सामान्य जाति के लोग नहीं दे पाएंगे। सामान्य जाति के लोगों द्वारा जहां तक योग्यता की बात करने का प्रश्न है उनकी ४० और ५० साल पहले की शिक्षण संस्थाओं का हाल देखें। इसमें जातिवाद के नाम पर उन्होंने अपने ही समाज के योग्य लोगों को दरकिनार कर लफंगों और मूर्खों को शिक्षक का तमगा देने का काम किया है। उन्हें अपने समाज तक में योग्यता पसंद नहीं है तो दूसरी जगह योग्यता की बात करने का उन्हें क्या अधिकार है। सवर्ण समाज के जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त लोगों को नैतिकता, योग्यता और संवेदना के सवाल तभी याद आते हैं जब उनके अधिकारों का विकेंद्रीकरण हो। मंडल आयोग की रिपोर्ट के विरोध में दो-तीन दर्जन उनके लड़कों ने आत्महत्या कर ली तो यह संवेदना का सबसे बड़ा मुद्दा हो गया, लेकिन अगर दुराग्रह में आत्मघात करना ही मानवीय संवेदना के लिए सबसे बड़ी ललकार है तो कश्मीर के मुजाहिदीन भी उनकी हमदर्दी के हकदार होने चाहिए जो कि किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं एक उसूल के लिए फिदाईन बने हुए हैं। भले ही उनका वह उसूल हमारी राष्ट्रवाद की परिभाषा के सांचे में फिट न बैठता हो। इस मामले में समय-समय पर चर्चा होती रहेगी। फिलहाल तो आपको निर्भीक पोस्ट के लिए बधाई…

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    16/09/2012

    आदरणीय के० पी० जी, आपकी बात poori तरह से सत्य है, आपकी निर्भीक प्रतिक्रिया तथा सम्बंधित विषय से उदाहरण देने के लिए धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
15/09/2012

आदरणीय अनिल जी ,..सादर अभिवादन शायद आपको पहली प्रतिक्रिया दे रहा हूँ ,..आपके नाम से एक तांत्रिक की याद आ गयी जिनका वर्गीकृत प्रचार अक्सर अखबार में दिखता था (सब लाइलाज परेशानिओं का आख़िरी इलाज !….पंडित समीर खान )….[यह बात विशुद्ध विनोद में कही है कृपया किसी तरह से अन्यथा मत लीजियेगा ] आरक्षण पर आपका लेख बहुत विचारशील और प्रभावी है ,…यह बात बिलकुल मानने योग्य नहीं है कि दलितों पर हजारों साल अत्याचार हुआ है ,यह इतिहासकारों का सफ़ेद झूठ है ,…..इतिहास गवाह है कि तमाम दलित(शायद तब नहीं) योद्धा ,राजा ,सामंत होते रहे हैं ,.. विदेशी आक्रमणों के साथ हमारी संस्कृति में गिरावट आई फलस्वरूप सामजिक पतन और अत्याचार हुए हैं ,…दूसरा आरक्षण अपने मकसद को पूरा भी नहीं कर सका और समाज में दूरी बढ़ने का कारण बना ,…मेरे विचार से अब जातियों को समाप्त कर वर्ग आधारित व्यवस्था बनानी चाहिए ,..सब मुसीबत की जड़ गरीबी है ,…उसे दूरकर सभी विसंगतियों से पार पाया जा सकता है ,…. आपने कोष्ठक में विशेष लाजिमी प्रश्न किया है अतः मेरा कहना है कि हाँ हम सामान होना चाहते हैं ,..किसी आरक्षण के लिए नहीं बल्कि समान इंसानियत के लिए ,…यही सही रास्ता होगा ,…सामान और भारतीय शिक्षा के बिना भी समानता दूर की कौड़ी होगा ,…मंजिलें बहुत हैं ,..रास्ता एक है ,..उसीपर सबको चलना होगा ,.. बढ़िया पोस्ट के लिए सादर हार्दिक आभार

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    16/09/2012

    संतोष कुमार जी, आपकी बातों में थोडा सा विरोधाभास है….एक तरफ आप दलितों पर होने वाले अत्याचार को इतिहासकारों का सफ़ेद झूठ लिखते हैं दूसरी तरफ आप इतिहासकारों के इस वर्णन का समर्थन करते हैं की निम्न वर्ग के कई लोग राजा-महाराजा हुए हैं!……मानना है तो दोनों बातें मानिए अन्यथा एक भी नहीं, क्योंकि यह आवश्यक नहीं है की निम्न वर्ग के कुछ लोग किसी समय विशेष में तथा किसी क्षेत्र विशेष में राजा हुए तो बाकी समय, बाकी क्षेत्रों में दलितों पर अत्याचार नहीं हुआ, ज़रूर हुआ है और हैवानियत की हद तक हुआ है, सत्य-सत्य है जो ऑंखें बंद कर लेने से छिप नहीं सकता! आरक्षण ने किसी भी तरह भेद-भाव को बढ़ाया नहीं बल्कि कम किया है, क्योंकि इसी के चलते सामान्य वर्ग के लोग अब कहने लगे हैं की हम सब बराबर हैं, इसलिए आरक्षण को ख़त्म कर देना चाहिए, और जिस इंसानियत और समानता की बात आप कर रहे हैं, उस पर कुठाराघात होने की एक नहीं कई-कई व्यक्तिगत यादें अभी तक हैं मेरे दिल-दिमाग में हैं साथ ही वर्तमान समय में भी यह पक्षपात जारी है! जो सामान्य वर्ग के लोगों की मानसिकता को दर्शाता हैं, किन्तु इन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ना ज़रूरी है…..ये लड़ाई समानता के लिए है कृपया इतिहास का, गांधी के अछूतों के उद्धार का, डॉ० आंबेडकर के संघर्षमय जीवन और उनके साथ हुए भेदभाव का अध्ययन कीजिये….उस समय समाज में आरक्षण नहीं था…धन्यवाद

    Santosh Kumar के द्वारा
    22/09/2012

    अनिल जी ,..सादर नमस्कार विचार्शीक प्रतिउत्तर के लिए बहुत आभारी हूँ ,..आपके विचारों का पूरा सम्मान करता हूँ,…..दरअसल विरोधाभास ही हमारी सच्चाई है ,..हमें स्वीकार करना होगा कि अलग अलग काल ,राज्य और परिस्थिति में अलग अलग स्थिति रही है ,.सत्य को झुठलाना मेरा मकसद नहीं है ,….मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि आपस में लड़ना समग्र रूप से हमारा नुक्सान ही करता है ,…आरक्षण यदि अपना मकसद पूरा करता तो अब तक समाप्त हो चूका होता और समाज बराबरी पा चूका होता ,….निजी अनुभवों और पिछले दो चार सौ सालों के लूट राज के आधार पर प्राकृतिक समतावादी संस्कृति को भूलना भी गलत है ,..मानसिकता बदलना ही सबसे सरल और कठिन है ,..पक्षपात और असमानता का हल लड़ाई नहीं है ,..आपने प्रतिक्रिया के सिर्फ नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दिया इसलिए कुछ खेद है ,. मैं निपट मूरख इंसान हूँ ,…इतिहास को ज्यादा नहीं समझ पाता ,..समझता हूँ तो अवसरवादिता और निजस्वार्थ ही दिखता है ,….वही विचार समझता हूँ जिनको महसूस करता हूँ ,…गांधीजी से बेहतर मैं अपने दादाजी को मानता हूँ ,.सामान्य जाती के होते हुए उनके अनेकों सर्व जाती घनिष्ठ मित्र थे ,..दलित पिछड़े सब उनके लिए बराबर थे ,….जरूरत पर उन्होंने खुद भूखे रहकर उनका साथ दिया ,… ..गांधीजी जब हर बात पर उपवास कर सकते थे ,..अछूतों का उद्धार कर महामानव बन सकते थे तो जातिओं को समाप्त करने के लिए क्यों कुछ नहीं किया ,..उस समय सामान शिक्षा की वकालत क्यों नहीं की ?…,जो कि गुरुकुल व्यवस्था लागू करवाकर संभव थी ,….क्यों विलायती बाबू उनको पसंद थे ?..मुझे पूरा यकीन है कि यदि वो ऐसा करते तो बाबा साहेब उनके विरोधी नहीं उनका दांया हाथ बनते ,..और अबतक देश से जातियों का अस्तित्व समाप्तप्राय हो गया होता . हमें अपने इतिहास की नकारात्मक बातें छोड़कर सकारात्मक पहलुओं को लेकर आगे बढ़ना चाहिए ,..सब सामान ही हैं ,.. ह्रदय से स्वीकारना शेष है ,..सादर आभार सहित

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/09/2012

    संतोष जी, सत्य को आपने स्वीकार किया आपके विचारों में जो सत्य परिलक्षित हो रहा है उसे मै भी स्वीकार करता हूँ, गांधी का नाम मैंने सिर्फ इसलिए लिया था क्योंकि उनके कर्मो द्वारा इस बात की तो पुष्टि हो ही रही है, की छुआछूत समाज में थी! समानता के समर्थन के लिए आपका आभार

pitamberthakwani के द्वारा
15/09/2012

अब आपका नाम सार्थक लग रहाहै अनिल कुमार ,’पंडित समीर खान’,आपके पोस्ट को पूरा पढ़ा , और सभी टिप्पड़ियों को भी! अपने चाहा है की पूरी प्रितिकिर्या दी जाए सो सही है, पर हर विद्वान् ने जो लिखा है सबकी बातों को मिला कर सब बातों का जवाब आ ही गया है, क्योंकि मैं आप की पोस्ट को देर से देख पा रहा हूँ इसलीय्ये कोई नयी बात नहीं लिख सक़ता ,जो सबने लिखा है उसका निचोड़ यही है की आप को इसकी गहन जानकारी है,इससे और अछा कौन कह,लिख सकता है आप से पहले मैं अपने को ही सपाटबयानी का विद्वान् समझता था अब मेरा यह तिलस्म टूट गया ! आपकी पोस्ट के लिए धन्यवाद!वह भी बहुत-बहुत!!!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    16/09/2012

    बहुत बहुत शुक्रिया पीताम्बर जी, आपकी समस्त बातों का निचोड़ मेरे अनुसार यही है, कि आप जाति प्रथा की समाप्ति और समाज में बराबरी के पक्षधर हैं!

yogi sarswat के द्वारा
14/09/2012

अब बात यह उठती है कि क्या वाकई इस आरक्षण का फायदा उस विशिष्ट वर्ग को मिल रहा है, जिसके लिए इसे संविधान द्वारा लागू किया गया था? नहीं….उस स्तर का सुधार नहीं हुआ है जिस स्तर का सुधार होना चाहिए था क्योंकि इसे लागू करने वाली सात्ताधारी दल ने कभी भी इसे पूरी निष्ठां एवं ईमानदारी से लागू करना ही नहीं चाहा, बस इसे एक लौलीपौप बना दिया गया तथा इसे हर बार चुनाव आने से पहले उस वर्ग को के सामने इसे चांटने के लिए रख दिया जाता है जिससे कि यह सम्बंधित है! गौरतलब है की आरक्षण की व्यवस्था को संविधान में डॉ० आंबेडकर द्वारा शुरुवाती 10 -15 वर्षों के लिए ही रखा गया था, क्योंकि उनके अनुसार यदि इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू किया जाता तो शुरू के 10 -15 वर्षों में ही असमानता समाप्त हो जाती! किन्तु वह कौंग्रेस जो आजादी के पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों को दिए जाने वाले विशिस्ट चुनाव के अधिकारों के विरोध में थी तथा जिसके विरोध में गांधी ने आमरण अनशन किया! जिससे डॉ० आंबेडकर तथा दलित समाज ने अपने विशिष्ट चुनाव के अधिकारों का त्याग कर दिया! वही कौंग्रेस बाद में आरक्षण को हनुमान की पूंछ की तरह लंबा करते रहने में ही अपनी भलाई देखने लगी! इससे अधिक इस स्वार्थी दल की क्या पोल खोली जाए! इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में इतनी खामियां रही की कभी भी इसका पूरा फायदा उस वर्ग को नहीं मिला जिसके लिए इसकी व्यवस्था की गयी थी! इसी का परिणाम है कि आज़ादी के बाद 65 वर्ष गुजर गए लेकिन आरक्षण की वह व्यवस्था जिसे मात्र 10 -15 वर्षों में समाप्त हो जाना चाहिए था, आज भी बनी हुयी है ! लेकिन यह तो स्पष्ट है कि इसका कुछ फायदा ज़रूर उस वर्ग को मिला है जिसके लिए यह थी! तभी आज बाकी वर्ग की ज़्यादातर जनसँख्या यह कहने लगी है कि अब भेदभाव नहीं रह गया है सभी बराबर हो गए हैं तथा जो आरक्षण है उसका सही फायदा अब उस वर्ग तक नहीं पहुँच रहा है जिसके लिए यह है, इसलिए अब आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए!……सही बात है आरक्षण का ज़्यादातर फायदा उस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है जिसे यह मिलना चाहिए था! किन्तु फिर भी इस आरक्षण के चलते बहुत से पिछड़े वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है! हाँ इस व्यवस्था का कुछ दुरूपयोग भी हुआ है! लेकिन भईया ये कौन सी अनोखी बात है? भारत में तो प्रत्येक क्षेत्र ऐसा ही है जहाँ जो व्यवस्था जिसके लिए की जाती है, उस तक उस वयस्था का मात्र 5 -10 प्रतिशत ही पहुँचता है बाकी सब घपलों और घोटालों या कमीशनखोरी में चला जाता है! अब क्या आप कहेंगे की समस्त योजनायें बंद कर दो क्योंकि उसका सही हक उसके सही हक़दार तक नहीं पहुँच रहा! तब तो समस्त योजनाये रुक जायेंगी! इसलिए आवाज़ तो ज़रूर उठाइये लेकिन जो लोग गलत कर रहे हैं उनके खिलाफ, न की किसी ऐसी विशिष्ट योजना के खिलाफ जिससे कुछ हक़दार लोगों का भला हो रहा, लेकिन उसमे अन्य व्यक्तियों की वजह से खामिया आ गयी हैं, उसमे भी बड़ी लापरवाही शासन की तरफ से ही की जा रही है! आपका आधा लेख मैंने कॉपी कर दिया क्यूंकि मुझे लगा की आपके विचार इतने सटीक है की मैं अगर अपनी तरफ से कुछ कहूँगा तो उनकी शोभा बिगड़ जाएगी ! मेरे लिए कुछ कहना बाकी ही नहीं रखा आपने

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    14/09/2012

    योगी जी सादर, इतना होने पर भी आपकी प्रतिक्रिया अधूरी ही रह गयी…हो सके तो इसे पूरा कर दीजियेगा

TIWARI DEEPAK के द्वारा
13/09/2012

आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसे राजनीतिक दल कभी खत्म नहीं होने देंगे..ताकि वे आरक्षण की चूल्हे पर अपनी  सियासी रोटियां सेंकते रहें…निश्चित तौर पर इसका लाभ मिलने वाला वर्ग इसका समर्थन करेगा….जबकि दूसरा विरोध….ये सिलसिला चलता ही रहेगा… 

    vikramjitsingh के द्वारा
    13/09/2012

    आदरणीय तिवारी जी…..के विचारों से सहमती…… सादर अनिल जी…

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/09/2012

    सादर, कृपया अधूरी प्रतिक्रिया न दे सबसे लाजिमी प्रश्न है की क्या तथाकथित श्रेष्ठ वर्ग जाति-पाति को त्याग कर समान होना चाहता है? जिसका जवाब ऐसे वर्ग के लोगों को देना चाहिए….अन्यथा आरक्षण हाय-हाय करने से कुछ भी बदलने वाला नहीं…. सादर

Chandan rai के द्वारा
12/09/2012

अनिल मित्र , आपने तथ्यात्मक आधार पर बहुत ही लाजिमी प्रशन उठायें है ! आरक्षण का पैमाना पत्थर की लकीर ना होकर एक समय समय पर दलितों की सामाजिक स्थिति देखते हुए उसमे एक बदलाव पर आधारित होना चाहिय ! यदि किसी .दलित पिछड़े की सामाजिक स्थिति बेहतर हो जाती है तो उसकी आने वाली पीढ़ियों को इसके लाभ से मुक्त करना चाहिय ! बेहतरीन आलेख !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/09/2012

    जी चन्दन जी, बहुत ही लाजिमी प्रश्न जिन्हें मैंने उठाया है उसमे सबसे लाजिमी प्रश्न है की क्या तथाकथित श्रेष्ठ वर्ग जाति-पाति को त्याग कर समान होना चाहता है? जिसका जवाब ऐसे वर्ग के लोगों को देना चाहिए

12/09/2012

सादर नमस्कार! सार्थक और विचारणीय प्रशन उठाया आपने है……………………परन्तु जाति विशेष की बात न करते हुए मैं मानव स्वभाव की बात करना चाहूँगा…..जिसके कारन हरेक व्यक्ति अपना और अपने समुदाय का भला चाहता है………… तो इस आधार पर मैं कहना चाहूँगा कि शिक्षा और सर्विस के क्षेत्र में सवर्ण जातियों का दबदबा और संख्या दोनों ही अधिक था जिसके कारण दलित और पिछड़ा वर्ग हरेक जगह पिछड़ते गए…अतः इस गैप को ख़त्म करने के लिए…………….आरक्षण लाया गया…………….! जिसके कारण अब स्वर्ण जाति के अधिकारों का हनन होने लगा…….अतः दोनों ही परिस्थितियां मानवीय विकास के लिए हानिकारक साबित हुई……………..क्योंकि इससे चारो तरफ असंतोष ही फैला…………! इन समस्याओं का समाधान तब तक संभवा नहीं है जब हम इसका समाधान मानसिक और मानवीय स्तर पर तलाश किया जाय…………..आज भी सबसे अधिक जमीं, नौकरियां, पूंजी और सत्ता कुछ विशेष जातियों के पास ही संरक्षित है……………….जो हरेक जगह और हरेक डिपार्टमेंट में स्पष्ट दीखता है………………..मैं तो कहता हूँ……………..कि सब कुछ ख़त्म करके सभी में सामान रूप से सब कुछ वितरित किया जाय…….

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/09/2012

    अलीन जी, बात तो आप सही कह रहे हैं किन्तु शायद इतनी हिम्मत किसी सरकार में नहीं होगी की वह ऐसा कदम उठा पाए….इसके अलावा कोई भी सरकार इतना अच्छा प्रबंध भी नहीं कर पाएगी कि इस व्यवस्था में अनियमितता न बरती जा सके…. इसलिए कोई व्यावहारिक उपाय ही इस असमानता को दूर कर सकता है…. अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद


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