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लड़की ही नहीं लड़के को भी सुशील बनाइये

Posted On: 19 Sep, 2012 में

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प्राचीन काल से ही नारी को एक उपभोग की वस्तु से अधिक कभी नहीं समझा गया तथा धर्म, संस्कृति, मर्यादा इत्यादि के नाम पर नारी को त्याग करने और बंदिशों में बाँधने का चलन भारतीय समाज की पहचान है, कुछ लोग इसे समाज में घटने वाली घटनाओं के आधार पर सही ठहराने की कोशिशे करते भी देखे जाते हैं….किन्तु कोई भी ऐसा कारण जो किसी वर्ग विशेष को, बिना उसके द्वारा की गयी किसी गलती के आधार पर किसी बंदिश में बाँधने की वकालत करता है, सरासर गलत है तथा पुरुष वर्ग स्त्रियों पर बंदिशे लगाने की वकालत ऐसे आधारों पर करता चला आ रहा है, जिसका दोषी पुरुष ही रहा है, जैसे स्त्री की इज्ज़त पर घर के बाहर हमला हो सकता है….जिसे करने वाला तो कोई पुरुष ही होगा, साथ ही एक सत्य यह भी है की स्त्री की इज्ज़त पर हमला करने वालों में आधे से ज्यादा घटनाएं किसी चिर-परिचित द्वारा ही की जाती हैं! घर के बाहर पुरुष भी निकलते हैं, लेकिन ऐसा शायद ही कभी हुआ हो की स्त्रियों के किसी झुण्ड ने किसी पुरुष के कपडे फाड़ दिए हों! !

लड़का हो या लड़की दोनों में विकास करने की बराबर की संभावनाएं रहती है, लेकिन हम सिर्फ लडको को प्रोत्साहन देते हैं और लड़कियों को किसी न किसी नाजायज़ कारण से हतोत्साहित करते हैं! आज भी लड़कियों को अधिक पढ़ाने-लिखाने के बाद अक्सर जल्द शादी कर दी जाती है और उसे नौकरी करने नहीं दिया जाता या कभी कभी शादी के बाद ससुराल वाले इस आधार पर नौकरी छुडवा देते हैं की “बहु घर का ध्यान नहीं रख पा रही है, फिर घर में बहु लाने का फायदा ही क्या?”

जब शादी के लिए लड़का या लड़की देखने की शुरुआत होती है….तो उसके लिए एक लड़के में क्या गुण होने चाहिए और एक लड़की में क्या? इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण अखबार के शहनाई वाले पृष्ठ पर रहता है! लड़की सुन्दर, सुशील, घरेलु, कामकाजी साथ ही सर्व गुण संपन्न होनी चाहिए, वही लड़का सिर्फ कमासुत हो तो काम बन जाता है! क्यों ? लड़कों का सुशील, घरेलू, कामकाजी और सर्वगुण सम्पन्न होना ज़रूरी क्यों नहीं? नहीं….क्योंकि ऐसे लड़के मिलेंगे ही नहीं! क्योंकि हम जिस परिवार और समाज में लड़के और लड़की का उत्पादन करते हैं, वहां ये गुण सिर्फ लड़कियों में ही डाले जाते हैं, लडको में नहीं! बहुत कम ऐसे लड़के मिलेंगे जिनका चरित्र अच्छा हो, जो नशा न करते हों साथ ही ऐसी बहुत कम लड़कियां होंगी जिनका चरित्र खराब हो और जो नशा करती हों! क्योंकि हमारे समाज द्वारा लडको को अनावश्यक छूट दी गयी है! जिसे यदि कम कर दिया जाए तो पूरे समाज के लिए और खासकर स्त्री वर्ग के लिए अच्छा होगा! याद रखिये की स्त्री वर्ग में पुरुषों की माँ, बहन, पत्नी और बेटियाँ भी आती हैं!

प्राकृतिक रूप से स्त्री और पुरुष में सिर्फ शारीरिक बनावट में भिन्नता होती है, लेकिन आगे का समस्त व्यवहार सुनियोजित तरीके से घर के अन्दर और उसके पश्चात समाज द्वारा गढ़ा गया होता है! स्त्री को आप समस्त अच्छी चीज़े सिखायेंगे, सुबह जल्दी उठना सिखायेंगे, पूरे कपडे पहनना सिखायेंगे, घर की साफ़-सफाई करना सिखायेंगे, खाना बनाना सिखायेंगे, घर के बाहर कम से कम जाने देंगे और जहाँ तक हो सकेगा किसी बड़े के साथ ही भेजेंगे! साथ ही इस बात का भी ध्यान रखेंगे की उसकी सहेलियों का आचार-व्यवहार उपयुक्त है या नहीं! मैं ये नहीं कहता की यह गलत है किन्तु यह अन्यायपूर्ण भेद-भाव है! क्या समस्त अच्छे कामों की ज़िम्मेदारी स्त्रियों की ही होती है? नहीं… हमें अपने लड़के एवं लड़की दोनों को घर की साफ़-सफाई रखना, घर के कामों में हाँथ बटाना, बड़ों की आज्ञा लेकर घर के बाहर जाना और जहाँ तक हो सके किसी बड़े के साथ ही बाहर जाने, अच्छे मित्र बनाने इत्यादि की शिक्षा देनी चाहिए! लड़का हो या लड़की दोनों को कुछ घरेलु खेल तथा कुछ बाहरी खेल जैसे, क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिन्टन इत्यादि खेलने के लिए बराबर को प्रोत्साहित करना चाहिए! दोनों को अपना तन और मन स्वस्थ रखने का अधिकार है! आज बहुत कम प्रोत्साहन मिलने के बावजूद भी साइना नेहवाल, मैरिकौम सरीखी कई लडकियां, स्त्रियाँ सम्पूर्ण विश्व में भारत का नाम रौशन कर रही है! आप एक तरफ लड़कों को बाहर खेलने जाने की छूट देते हो और दूसरी तरफ लड़की से घर के काम-काज करवाते हो, ये दोनों कार्य शरीर को स्वस्थ रखते हैं, लेकिन जहां एक तरफ ये लड़की में हीन भावना को बढाते हैं, दूसरी तरफ लड़के में श्रेष्ठ होने की भावना को! ऐसे में अक्सर लड़के लड़कियों को चिढाते भी हैं तथा नौकरानी कहकर भी अक्सर संबोधित कर देते हैं! इसके अलावा बहुत बुरी बात यह है की लड़का अपने स्वयं के काम भी स्वयं न करके अपनी बहन से ही करने के लिए कहता है, जैसे पानी लाने, खाना निकालने, कपडे धुलने के लिए इत्यादि काम! जबकि होना यह चाहिए की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद दोनों को अपने अन्य समस्त काम स्वयं करने के साथ-साथ घर से सम्बंधित कुछ आवश्यक कामों की शिक्षा देनी चाहिए!

माता-पिता को ध्यान रखना चाहिए की लड़के-लड़की दोनों आज के युग में बराबर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, दोनों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए या नौकरी के लिए कभी भी बाहर जाना पड़ सकता है! ऐसे में लड़की हो या लड़का दोनों ही जब स्वयं अपने सारे कामों को करने के अभ्यस्त होंगे तो उन्हें भावी जीवन में भी कोई तकलीफ होने के संभावना कम होगी!

साथ ही सबसे ज्यादा ज़रुरत आज के युग में चारित्रिक शिक्षा की है, जो की टेलीविजन द्वारा पूरी तरह से नष्ट कर दी गयी है तथा माता-पिता भी बच्चों को बिना उचित रोक-टोक के ज़्यादातर कार्यक्रम देखते रहने देते है, उसमे भी अधिक छूट लडको को दी जाती है! क्यों ? आपका बच्चा क्या गलत चीज़े नहीं सीख रहा, क्या कल वह नासमझी में घर में या बाहर कोई अनैतिक व्यवहार नहीं कर सकता? करता ही है….घर वालों की नजरो से बचाकर, कभी स्कूल में, कभी सड़क पर, कभी पार्कों में, सारी अव्यवस्था तो पुरुष वर्ग ही फैला रहा है किन्तु बंदिशे नारी पर, यह कैसे जायज है? आप अपने लडको को उचित आचरण की शिक्षा नहीं दे पा रहे, सेंसर बोर्ड टेलीविजन और फिल्मों की उचित काट-छांट नहीं कर रहा, सरकार स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही…..देखा जाए तो सारी गलती उस ज़िम्मेदार वर्ग की है, जो अपनी कमियों पर नज़र डालना ही नहीं चाहता, जो अपने कर्त्तव्य निभाना ही नहीं चाहता, बस बहाने बनाना जानता है !

अन्य ज़िम्मेदार लोगों से अधिक ज़रुरत इस बात की है की माँ-बाप दोनों अपने लड़के और लड़की दोनों को बराबर समझें, उन्हें घर-बाहर दोनों जगहों की बराबर ज़िम्मेदारी उठाने दे, सदा इस बात के प्रति सजग रहे की बच्चे टेलीविजन और इन्टरनेट पर कौन से चीज़े देख रहे हैं, कंप्यूटर पर कौन सा कार्य किया जा रहा है, वे जो किताबें पढ़ रहे हैं उनमें कोई अनावश्यक और गलत शिक्षा देने वाली किताबें भी तो नहीं है! कोई भी छोटी या बड़ी गलती किये जाने पर कभी भी उसे नज़रंदाज़ न करें और बच्चे का उचित मार्गदर्शन करें तथा आवश्यकता पड़ने पर कठोर कदम भी उठायें! याद रखे जब तक समस्त लडको और लड़कियों दोनों का आचरण श्रेष्ठ नहीं होगा, तब तक समाज में होने वाले चारित्रिक पतन को रोका जाना असंभव है! आज हमारे भारतीय समाज में श्रेष्ठ गुणों से संपन्न लड़कियों से ज्यादा कमी श्रेष्ठ गुणों से संपन्न लडको की है! हाँ सिनेमा जगत में कुछ स्त्रियाँ पैसों के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है जिन्हें अपवाद कहा जा सकता है! ज़रुरत इस बात की है की हम ऐसी वाहियात चीजों से अपने बच्चो को दूर रहने की शिक्षा दे तथा उसके लिए सदा सजग होकर कदम उठायें ! लड़की ही नहीं लडको को भी सुशील बनाएं!

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
13/10/2012

बहुत सुन्दर आलेख,आदरणीय अनिल जी.कुछ समय पहले पढ़ा था लेकिन किसी वजह से प्रतिक्रिया नहीं दे पाया था.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय राजीव जी, कोई बात नहीं, देर आये दुरुस्त आये प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

sudhajaiswal के द्वारा
10/10/2012

आदरणीय अनिल जी, बहुत खूब लिखा है आपने, हर बात से मेरी सहमती है, बहुत-बहुत बधाई इतने अच्छे आलेख के लिए!

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    10/10/2012

    बहुत बहुत शुक्रिया सुधा जी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया के लिए

sumandubey के द्वारा
09/10/2012

अनिल जी नमस्कार, सुन्दर विचार पूर्ण आलेख सत्य लिखा आपने ———————————————- प्राकृतिक रूप से स्त्री और पुरुष में सिर्फ शारीरिक बनावट में भिन्नता होती है, लेकिन आगे का समस्त व्यवहार सुनियोजित तरीके से घर के अन्दर और उसके पश्चात समाज द्वारा गढ़ा गया होता है!

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    10/10/2012

    बहुत बहुत शुक्रिया सुमन जी

deepasingh के द्वारा
08/10/2012

अनिल जी आपने महिलाओं की स्तिथि पर बहूत उचित कहा है. कहने को आज खा जाता है की महिलाय आज पुरुषो के बराबर है पर समाज सिर्फ बोलता है और व्यवहार में लाने के लिय करता कुछ भी नहीं. मेने अपने एक अन्य लेख मेंलडकियों के मनोभावों को कविता के रूप मई रखा है. जिसका शीर्षक है कहे पंची बस इतना आधा करती हु आप उसे अवश्य पढेंगे. धन्यवाद.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    09/10/2012

    धन्यवाद दीपा जी, अवश्य ही पढूँगा

Alka के द्वारा
07/10/2012

बहुत सुन्दर लेख है | बधाई हो!

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/10/2012

    आपका बहुत बहुत शुक्रिया

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
04/10/2012

नमस्कार जी बहुत हीअच्छे आलेख के लिये बधाई ,,वर्तमान मे यह सोच जरुरी है ,,

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    08/10/2012

    नमस्कार अनुराग जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

pitamberthakwani के द्वारा
28/09/2012

आपके सुझाव अछे हैं तभी तो आपकी रचना को सराहा गया है! जागरण द्वारा भी,अब आपके कहे अनुसार बदलाव की जरूरत है और यह बदलाव आ रहा है धन्यवाद समाज की के आंखे खोलने के लिए! समीर जी!

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    28/09/2012

    आदरणीय पीताम्बर जी, सुझाव तो मेरे अक्सर अच्छे ही रहते हैं, लेकिन जब तक उन्हें आप जैसे अनुभवी लोगों का समर्थन न मिले, तब तक मज़ा नहीं आता, अब आपका समर्थन मिला बहुत अच्छा लगा

ashishgonda के द्वारा
24/09/2012

“लड़की ही नहीं लड़के को भी सुशील बनाइये” आदरणीय! सादर प्रणाम, वैसे तो केवल शीर्षक ही बहुत कुछ कह रहा है, उस पर उसका विस्तार तो मानो सोने पे सुहागा. मेरे पास शब्द नहीं है की मैं आपकी प्रशंसा कर सकूँ इसलिए क्षमा चाहता हूँ. एक आवश्यक और महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक लेख के लिए आभार……..

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    28/09/2012

    आशीष जी, जितना भी आपने लिखा उतना पर्याप्त है, प्रतिक्रिया देने के लिए आपका आभार

aartisharma के द्वारा
24/09/2012

समीर जी ,बेहद सुलझी हुई और उच्चस्तरीय सोच है आपकी…वर्तमान युग के सन्दर्भ में एक अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई..

shashibhushan1959 के द्वारा
22/09/2012

मान्यवर समीर जी, सादर ! समय की मांग के अनुकूल रचना !

22/09/2012

अति सुंदर आलेख..

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
22/09/2012

बहुत ही अच्छा आलेख सत्य वचन ,,,,,,,,,एक सत्य यह भी है की स्त्री की इज्ज़त पर हमला करने वालों में आधे से ज्यादा घटनाएं किसी चिर-परिचित द्वारा ही की जाती हैं! घर के बाहर पुरुष भी निकलते हैं, लेकिन ऐसा शायद ही कभी हुआ हो की स्त्रियों के किसी झुण्ड ने किसी पुरुष के कपडे फाड़ दिए हों! !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/09/2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अनुराग जी!

yogi sarswat के द्वारा
22/09/2012

अनिल जी, नमस्कार ! बेहतरीन लेखन आपकी लेखनी से निकलता है ! नारी जीवन की व्यथा व लड़कों व लड़कियों से भेद के सवाल को आपने सुंदर अंदाज में उठाया। काश सभी अभिभावक इससे सबक लें। तभी कुछ बात बन सकती है !

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    22/09/2012

    सही बात है योगी जी, सभी अभिभावक इससे सबक लें। तभी कुछ बात बन सकती है ! सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद

vikramjitsingh के द्वारा
21/09/2012

पूर्णतया सहमती….. वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए अति उत्तम विचारणीय आलेख…….

bhanuprakashsharma के द्वारा
21/09/2012

अनिल जी, नारी जीवन की व्यथा व लड़कों व लड़कियों से भेद के सवाल को आपने सुंदर अंदाज में उठाया। काश सभी अभिभावक इससे सबक लें। तभी समाज में समानता की कल्पना की जा  सकती है। नहीं तो कितना भी हम चिल्लाले रहें, जब तक हर कोई अपने घर से बेटे और बेटियो में समानता नहीं बरतेगा, तब तक कुछ नया होने वाला नहीं है। शिक्षाप्रद लेख के लिए बधाई। 

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    21/09/2012

    भानुप्रकाश जी, समर्थन तथा यथार्थ टिप्पड़ी के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

kpsinghorai के द्वारा
20/09/2012

लड़की सुन्दर, सुशील, घरेलु, कामकाजी साथ ही सर्व गुण संपन्न होनी चाहिए, वही लड़का सिर्फ कमासुत हो तो काम बन जाता है! क्यों ? लड़कों का सुशील, घरेलू, कामकाजी और सर्वगुण सम्पन्न होना ज़रूरी क्यों नहीं? अनिलजी, वैसे आपने वर्तमान हालातों को देखते हुए काफी सार्थक प्रश्न उठाते हुए उसका हल बताया है। अगर ऐसा हो जाए तब निश्चित रूप से समाज सुधार की परिकल्पना को साकार करने में काफी मदद मिल सकती है।

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    21/09/2012

    आदरणीय के० पी० जी, निश्चित रूप से मै भी यही चाहता हूँ की समाज में ये सकारात्मक बदलाव ज़रूर आयें आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

अजय यादव के द्वारा
20/09/2012

सादर प्रणाम | जे जे पर आपके जैसे लेख जीवन में काफी सबक सिखाते हैं |हर तरफ से उम्दा और बेहतरीन लेख | बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं सर |आप लाजवाब लिखते हैं ,संकलन योग्य लेख |सादर आभार |

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    21/09/2012

    अजय जी, इतनी अधिक सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार

yamunapathak के द्वारा
20/09/2012

आपका यह ब्लॉग प्रत्येक अभिभावक के लिए मार्गदर्शक साबित होगा और यह विषय ही स्वयं में सभी सामाजिक मूल्यों को समेटे है.मुझे यह तो नहीं मालूम की आप एक अभिभावक हैं या नहीं पर निस्संदेह आप के संस्कारों पर हम मंच के सदस्य गर्व करते हैं.मुझे हमेशा से एक ऐसे समाज,परिवार की अपेक्षा रही है जहां लड़कों को भी नैतिकता और सद्व्यवहार की वही शिक्षा दी जाए जो एक लडकी को दी जाती है. एक सुन्दर समाज की परिकल्पना को आधार देने वाली ऐसी रचना के लिए तहे दिल से आभारी हूँ.

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    21/09/2012

    यमुना जी, ह्रदय से दी गयी प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से आभार

20/09/2012

सुस्वागतम ! सार्थक और समय की जरूरत है यह आपकी पोस्टिंग……………..हार्दिक आभार………………………..! http://merisada.jagranjunction.com/2012/09/13/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%9c/

    Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    21/09/2012

    प्रतिक्रिया तथा समर्थन के लिए आपका हार्दिक आभार अलीन जी

manoranjanthakur के द्वारा
19/09/2012

बहुत सही मुद्दों को उठाया है आपने श्री अनिल जी बहुत बधाई


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