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जय हो जायसवाल जी की....

Posted On: 10 Oct, 2012 में

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“ नई-नई जीत और नई-नई शादी का अलग ही महत्व है। जिस तरह समय के साथ जीत पुरानी पड़ती जाती है उसी तरह वक्त के साथ बीवी भी पुरानी होती जाती है और उसमें वह मजा नहीं रह जाता है।”

उपरोक्त कथन को कहने वाले श्रीप्रकाश जायसवाल जी इसे कहते समय एक मंत्री नहीं बल्कि एक हास्य व्यंगात्मक कवि की भूमिका में स्वयं को प्रस्तुत करना चाह रहे थे! संभवतः उनसे पहले मंच पर कई कवियों ने हास्य व्यंग की कवितायें और बातें कही होंगी, जिन्हें सुनने के बाद उनका मन भी हास्य व्यंग से जुडी बातें करने का हो गया होगा, किन्तु इस मन की बात को पूरा करने के चक्कर में उन्होंने कुछ ऐसा बोल दिया, जिसका अर्थ बहुत गलत भी निकलता है! बहुत गलत भी निकलता है से मेरा तात्पर्य यह है कि उनके शब्द “उसमे वह मज़ा नहीं रह जाता है” से ऐसा अर्थ भी निकल सकता है कि पुरानी बीवी से लड़ने-झगड़ने, रूठने-मनाने, उसके मायके जाने और ससुराल वापस आने इत्यादि में शायद उतना मज़ा नहीं आता हो!

उपरोक्त विचार तो मेरे ह्रदय में उठे और मैंने उनके शब्दों के भावों को थोडा विस्तार देने की कोशिस की! किन्तु मैं कितना भी विनम्र होते हुए उनके शब्दों के भावों को प्रकट करूं, उनके शब्दों का स्पष्ट अर्थ यही निकल रहा है जोकि अधिकतर जनता सोंच रही है! “उसमे वह मज़ा नहीं रह जाता है” मतलब क्या है जायसवाल जी का? पत्नी क्या अपने पति को मज़ा दिलाने का साधन मात्र होती है? पत्नी से क्या आपका रिश्ता मात्र शारीरिक सुखों तक सीमित होता है, जिसे शायद वह पत्नी अपनी बढती हुयी उम्र के साथ आपको उस स्तर तक नहीं प्रदान कर सकती, जितना की अपने यौवनावस्था में कर सकती थी! क्या पत्नी से आपका मानसिक, आत्मिक, भावनात्मक तथा अपने बच्चों की माँ का रिश्ता नहीं होता? अगर ऐसा नहीं होता तो कोई आदमी विवाह ही नहीं करता क्योंकि उसके शारीरिक सुखों को वह प्राचीन काल से लेकर आज के युग में भी कई जगहों से पैसो के माध्यम से या अन्य माध्यम से पूरा कर सकता है!

पत्नी और पति का वास्तविक रिश्ता तो ह्रदय से होता है! जैसे-जैसे विवाह के बाद समय बीतता जाता है, वे एक-दूसरे की भावनाओं, ज़रूरतों और सुख-दुःख को भली भाँती समझने लगते हैं तथा पति-पत्नी के बीच वास्तविक प्रेम की उत्पत्ति होती है! तब उन्हें एक-दूसरे के साथ रहने में पहले से कहीं ज्यादा आसानी होती है, लड़ाइयाँ कम होती हैं! इसके अलावा जब उनके बीच उनकी अपनी संतान आती है, तब तो यह रिश्ता अटूट रूप से मज़बूत हो जाता है! ऐसे में कभी अपनी पत्नी का ध्यान न रखने वाला पुरुष भी उसकी ज़रूरतों, उसकी सेहत, उसकी खुशियों इत्यादि का ध्यान रखने लगता है! पति-पत्नी और उनकी संतान मिलकर एक नए परिवार, नए आशियाने का निर्माण करते हैं! जो उनके सपनो का घर होता है, जो वर्षों की मेहनत के बाद ही बन पाता है! जिसमे पति और पत्नी दोनों की सच्ची लगन और मेहनत शामिल होती है! फिर कैसे कोई समझदार, शादी-शुदा मर्द इस तरह का बयान दे सकता है?

जायसवाल जी शायद उस कवि सम्मलेन की ज़ोरदार हास्य की बयार में स्वयं पर काबू नहीं रख पाए और फिसल गए! उनका दिमाग सही-गलत का निर्णय नहीं कर सका! भरी सभा में चाहे हास्य लाने के लिए ही सही उन्होंने शायद अपनी व्यक्तिगत राय को ज़ाहिर कर दिया! देखा जाए तो कुछ मर्दों की यह राय हो भी सकती है की पुरानी बीवी में वो मज़ा नहीं आता, तभी तो समाज में आज भी शादी के बाद कई मर्द दूसरी औरतों से नाजायज़ सम्बन्ध रखते है, बल्कि इसका चलन शायद पहले से ज्यादा होता चला जा रहा है! कुछ शादीशुदा महिलायें भी ऐसे संबंधों को बनाने में गुरेज़ नहीं करती! किन्तु उनकी परिस्थितियां, उनकी सोंच, उनके संस्कार सभी इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं! जिनकी बात करना इस विषय से भटकना होगा!

बात श्रीप्रकाश जायसवाल जी की जो कि केंद्रीय मंत्री हैं, भरी सभा में उन्होंने एक बयान दिया जो कि सिर्फ स्त्रियों के लिए अपमानजनक नहीं है, बल्कि सभी शादी-शुदा मर्दों के लिए भी सोंचने का विषय है कि क्या वाकई उनकी पत्निया उन्हें मज़ा दिलाने का साधन मात्र हैं? यदि वाकई ऐसा है तो विवाह मत करिए अथवा विवाह से पहले होने वाली पत्नी को इस बात से अवगत करा दीजिये ताकि वह शादी करने या न करने तथा आपके साथ उचित व्यवहार करने का फैसला ले सके और अगर ऐसा नहीं है तो जो लोग शादी के बाद विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त हैं या होना चाहते हैं, ऐसा कुकृत्य न करें!


जागरण फोरम के सवालों को भी ले लेते हैं-

1. क्या एक वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री का यह बयान वाकई सरकार की अंदरूनी सोच को दर्शाता है?
उत्तर- यह तो स्पष्ट तौर पर उनकी व्यक्तिगत राय है, जिससे वे भी स्वयं बाद में मुकर गए!

2. इस मुद्दे पर श्रीप्रकाश जायसवाल की सफाई को क्या पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है?
उत्तर- नहीं, क्योंकि है तो वो भी इंसान, मंत्री बन गए तो क्या हुआ? अच्छे-अच्छे लोग भी कभी-कभी भटक जाते हैं, फिर वो तो नेता हैं!

3. यदि हास्य-व्यंग्य के बहाने भी श्रीप्रकाश जायसवाल ने ऐसा बयान दिया है, तो क्या इसे सही ठहराया जा सकता है?
उत्तर- नहीं, बस इनके लिए एक सलाह है “जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे”! उतना सेन्स नहीं है तो हास्य व्यंग के क्षेत्र में न उतरे!

4. क्या श्रीप्रकाश जायसवाल का यह कथन पुरुष प्रधान समाज की कड़वी सच्चाई बयां करता है?
उत्तर- बिलकुल नहीं, यह उनके व्यक्तिगत वैवाहिक संबंधों की कडवी सच्चाई बयान करता है!

बाकी आम जनता से मेरा आग्रह है कि जायसवाल जी का अच्छा ख़ासा विरोध हो चुका है! आगे का विरोध मेरे ख्याल से उनकी पत्नी को करना चाहिए क्योंकि यह बयान और किसी के बजाय उन्ही से सीधे तौर पर सम्बंधित है, उन्हें ही जायसवाल जी से जवाब-तलब करना चाहिए की अब क्यों जायसवाल जी को उनमे वो बात और वो मज़ा नहीं आता!

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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
29/10/2012

बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला -

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
15/10/2012

आप के पांडित्यपूर्ण आलेख के LIYE व उक्ति वैचित्र्य हेतु हार्दिक आभार !! अनिल JEE BADHAAI BHEE !!

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    17/10/2012

    सादर नमस्कार विजय जी, आपकी पांडित्यपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, बधाई के लिए आभार भी!

MAHIMA SHREE के द्वारा
15/10/2012

नमस्कार अनिल जी … एक संवेदन शील विषय को जो मुर्खता के कारण आज सार्वजनिक हो गया है .. हमारे ही एक तथाकथित प्रतिनिधि के कारण जो खुद हास्य के पात्र हो चुके है ….. उस पर आपने बेहद संवेदनशीलता और संतुलित शब्दों में आलेख लिखा जो प्रसंशनीय है …… बहुत बधाई आपको

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    15/10/2012

    बहुत बहुत शुक्रिया महिमा जी, आपने इस विषय के प्रति मेरी संवेदनशीलता को समझा, आपका आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
14/10/2012

बाकी आम जनता से मेरा आग्रह है कि जायसवाल जी का अच्छा ख़ासा विरोध हो चुका है! आगे का विरोध मेरे ख्याल से उनकी पत्नी को करना चाहिए क्योंकि यह बयान और किसी के बजाय उन्ही से सीधे तौर पर सम्बंधित है आदरणीय समीर जी, नमस्कार आपकी यह लाइन आपके पुरे लेख का निचोड़ है………..वास्तव में जबतक घरेलू स्तर पर इन नेताओं का विरोध नहीं होगा और इनके अपने माँ, बहन और बीवियां इनका विरोध नहीं करेंगे ये यूँ ही मनमानी करते रहेंगे………….पर अभी तो सब पर नशा छाया है……….लुईस खुर्शीद को ही देख लीजिये सुन्दर लेख

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    15/10/2012

    सादर नमस्कार आनंद जी, आपने मेरे आशय को बहुत ही अच्छे से पकड़ा है तथा आपकी बातों से मैं सहमत हूँ बहुत बहुत शुक्रिया

chaatak के द्वारा
14/10/2012

स्नेही खान जी, सादर अभिवादन, हमारे यहाँ एक मसल का शगल है- खाता ना बही जो मंत्री जी कहें वही सही! अभी पूरी कांग्रेसी सरकार और यु०पी० की स०पा० सरकार का यही हाल है| अदम जी के शब्दों में- जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ खुलासा देखिये, आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!`

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    15/10/2012

    चातक जी, बहुत सटीक बातें लिखी हैं आपने अपनी प्रतिक्रिया में. धन्यवाद

omdikshit के द्वारा
13/10/2012

अनिल जी, नमस्कार. जयसवाल जी को क्या पता ……मियाँ की जूती मियाँ के सर पर ही पड़ेगी,वर्ना वह निकालते ही क्यों?बहुत अच्छे विचार आप के.आप ने भी सही स्थान पर लेख को भटकने से रोक लिया,वर्ना इन चैनल वालों का क्या भरोसा?

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय ओम जी, सही लिखा आपने, दरअसल आज-कल के सारे नेता ऐसी ही अदूर्द्रिष्टिता के परिचायक बनते चले जा रहे हैं! भारत वासियों के लिए बहुत अशोभनीय है ये! सटीक प्रतिक्रया देने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

nishamittal के द्वारा
13/10/2012

समीर जी,निश्चित रूप से नेता का अर्थ ही उस व्यक्ति से है,जो सबको राह दिखाए और मज़ाक हो या वास्तविकता ऐसे सस्ते शब्द सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना अशोभनीय ही है

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    हाँ निशा जी बिलकुल, किन्तु शायद आपको ऐसा भान हो रहा है की मैंने ऐसी प्रतिक्रिया को जायज़ ठहराया है, जैसा की बिलकुल नहीं है, मैंने सिर्फ यही चाहा है की एक पत्नी जिसका पति सरेआम ऐसी बात बोले उसे अपने पति से जवाब-तलब करने का अधिकार बाकी सभी महिलाओं से अधिक है, और जब तक एक पत्नी अपने पति से अपने लिए सम्मान नहीं अर्जित कर सकती, तब तक बाकी सारे दिखावों का कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

    Malik Parveen के द्वारा
    14/10/2012

    निशा जी से पूरी तरह सहमत हूँ …. समीर जी आपका आलेख मैंने दूसरी बार पढ़ा है अछा लिखते हैं आप यूँही लिखते रहिये… बधाई …

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    17/10/2012

    बहुत बहुत शुक्रिया परवीन जी, काश आप मुझसे भी सहमत होती, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

sudhajaiswal के द्वारा
13/10/2012

आदरणीय अनिल जी, सादर अभिवादन,क्या खूब व्यंग किये आपने, करारा प्रहार| अच्छे आलेख के लिए बहुत-बहुत बधाई|

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय सुधा जी, सम्पूर्ण लेख पढ़कर तथा इसे समझकर सटीक प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरे इस लेख के लिए महिलाओं की प्रतिक्रिया अधिक महत्व रखती है! ऐसे में आपकी प्रतिक्रिया से संतुष्टि मिली!

yogi sarswat के द्वारा
13/10/2012

यदि हास्य-व्यंग्य के बहाने भी श्रीप्रकाश जायसवाल ने ऐसा बयान दिया है, तो क्या इसे सही ठहराया जा सकता है? उत्तर- नहीं, बस इनके लिए एक सलाह है “जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे”! उतना सेन्स नहीं है तो हास्य व्यंग के क्षेत्र में न उतरे! 4. क्या श्रीप्रकाश जायसवाल का यह कथन पुरुष प्रधान समाज की कड़वी सच्चाई बयां करता है? उत्तर- बिलकुल नहीं, यह उनके व्यक्तिगत वैवाहिक संबंधों की कडवी सच्चाई बयान करता है! सही आंकलन किया है आपने समीर जी

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय योगी जी, सही अर्थ निर्वचन तथा महत्वपूर्ण बिन्दुओ को दर्शाते हुए, प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद

ashishgonda के द्वारा
13/10/2012

आदरणीय! सादर अभिवादन, मैं आपके आलेख को सम्पूर्ण समझता हूँ, हो सकता है ये मेरी अल्पज्ञता ही हो. परन्तु मुझे ये आलेख बहुत अच्छा लगा.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आशीष जी, हो सकता है यह आपकी उत्कृष्ट बौद्धिकता ही हो, सम्पूर्ण लेख पढ़कर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
13/10/2012

बहुत करारा व्यंग्य है,आदरणीय अनिल जी.आपकी बातों से इत्तिफाक रखता हूँ.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय राजीव जी, पूरे लेख को पढ़कर प्रतिक्रया देने के लिए धन्यवाद

seemakanwal के द्वारा
12/10/2012

इतना हल्ला -गुल्ला हुआ की अब आप को उनसे थोड़ी हमदर्दी हो गई है .

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    क्षमा कीजियेगा सीमा जी, आपने निश्चित रूप से या तो मेरे लेख को पूरा नहीं पढ़ा, या फिर आप उसका अर्थ समझने में गच्चा खा गयीं अन्यथा ऐसा कोई कारण नहीं है जिससे यह कहा जा सके की मुझे जायसवाल से कोई हमदर्दी है! हाँ मेरी नज़र में भ्रष्टाचार, महंगाई, धार्मिक और जातिगत दंगे, नैतिक पतन तथा स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा तथा घर के अन्दर ही होने वाले उनके अपमान जैसे मुद्दे अधिक अहमियत रखते हैं…..मैंने तो सिर्फ यही चाहा है की ऐसा वक्तव्य देने वाले जायसवाल से सवाल-जवाब तथा उनका विरोध करने का हक किसी अन्य स्त्री से पहले स्वयं उनकी पत्नी का ही है, जब तक एक स्त्री अपने घर में, अपनों से अपने लिए सम्मान नहीं पाएगी तब तक बाकी दुनिया से उसे जितना भी सम्मान मिले, वह महज़ दिखावा ही होगा! आपकी जानकारी के लिए बता दूं की मैं “स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली घरेलु हिंसा” पर शोध कर रहा हूँ, इसलिए इसकी भयावह स्थिति से परिचित हूँ! फिर वाही बात कहना चाहूँगा- जब तक एक स्त्री अपने घर में, अपनों से अपने लिए सम्मान नहीं पाएगी तब तक बाकी दुनिया से उसे जितना भी सम्मान मिले, वह महज़ दिखावा ही होगा!

shashibhushan1959 के द्वारा
12/10/2012

आदरणीय अनिल जी, सादर ! उच्च पदस्थ व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए ! अन्यथा ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना चाहिए, जो बहुत घातक होती हैं !

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/10/2012

    आदरणीय शशिभूषण जी मैं अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से नहीं रख पाया, क्योंकि इसमें मैं और बहुत सी बातें लिख सकता था, किन्तु यह थोडा जल्दबाजी में लिखा गया लेख है! क्षमा चाहता हूँ! किन्तु आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

bhanuprakashsharma के द्वारा
11/10/2012

अनिल जी, सुंदर लेख। भले ही जायसवाल ने हास्य के रूप में उक्त बात कही, लेकिन गलत है। व्यक्ति को हर बात कहने से पहले यह भी तोलना पड़ता है कि इसका असर कहां तक होगा। भरी सभा में इस जुबां पर और भी नियंत्रण ररखना पड़ता है, जो नेताजी नहीं रख पाए और जुंबा फिसल गई। 

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/10/2012

    मित्र भानुप्रकाश जी, मैं अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से नहीं रख पाया, क्योंकि इसमें मैं और बहुत सी बातें लिख सकता था, किन्तु यह थोडा जल्दबाजी में लिखा गया लेख है! क्षमा चाहता हूँ! किन्तु आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

deepasingh के द्वारा
11/10/2012

वन्दे मातरम अनिल जी. इस सरकार की जय हो जिसमे चुन चुन कर ऐसे नेता भरे हें जिनका न वाणी पर दें हे न अपनी बुध्ही पर की वो कह क्या रहे हे .अच्छा लेख बधाई.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/10/2012

    सत्य वचन दीपा जी वन्दे मातरम् मैं अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से नहीं रख पाया, क्योंकि इसमें मैं और बहुत सी बातें लिख सकता था, किन्तु यह थोडा जल्दबाजी में लिखा गया लेख है! क्षमा चाहता हूँ! किन्तु आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

yamunapathak के द्वारा
10/10/2012

अनिल जी आपने अपनी बात बखूबी ढंग से रखी है. साभार

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/10/2012

    आदरणीय यमुना जी, मैं अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से नहीं रख पाया, क्योंकि इसमें मैं और बहुत सी बातें लिख सकता था, किन्तु यह थोडा जल्दबाजी में लिखा गया लेख है! क्षमा चाहता हूँ! किन्तु आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

    yamunapathak के द्वारा
    13/10/2012

    मेरा मानना है की आप ने थोड़े शब्दों में भी इसके हर pros-cons को रखा है.

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय यमुना जी, इस लेख के समस्त पहलुओं को देखकर-समझकर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार नहीं तो शायद कुछ लोगों को ऐसा भान हो रहा है की मैंने इस लेख में जायसवाल का पक्ष लिया है! संभवतः उन्होंने सम्पूर्ण लेख को नहीं पढ़ा होगा!

अजय यादव के द्वारा
10/10/2012

आदरणीय अनिल सर,सादर प्रणाम | उम्दा आलेख …..भई अच्छे अच्छे लोग भटक जाते हैं फिर वो तो नेता हैं ….

    Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
    12/10/2012

    मित्र अजय जी, मैं अपनी बात बहुत अच्छे ढंग से नहीं रख पाया, क्योंकि इसमें मैं और बहुत सी बातें लिख सकता था, किन्तु यह थोडा जल्दबाजी में लिखा गया लेख है! क्षमा चाहता हूँ! किन्तु आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार तथा इस साधारण लेख को उम्दा कहने के लिए आभार


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